असंतुष्ट पाकिस्तानी देश के संविधान संशोधन के प्रयासों से चिंतित

वाशिंगटन,  पाकिस्तान के सूबों और जातीय समूहों की स्वायत्तता कम करने के इरादे से पाकिस्तानी सेना और न्यायतंत्र द्वारा देश के संविधान के 18वें संशोधन में बदलाव के प्रयासों पर अमेरिका स्थित असंतुष्ट पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों, लेखकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता जतायी है।

पाकिस्तानी संविधान के 18वें संशोधन को पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली (एनए) ने आठ अप्रैल 2010 को पारित किया था, जिसमें पाकिस्तान को एक अर्द्ध राष्ट्रपति शासन से संसदीय गणराज्य में तब्दील करते हुए देश के राष्ट्रपति द्वारा संसद भंग करने के उनके अधिकार को हटा दिया गया था और उत्तर-पश्चिम सूबा ए सरहद का नामकरण खैबर पख्तूनख्वा किया गया था।

इसके साथ ही संशोधन के जरिए पाकिस्तान के संविधान पर सैन्य शासकों के दशकों से चले आ रहे आधिपत्य को भी खत्म कर दिया गया था।
साउथ एशियंस अगेंस्ट टेररिज्म एंड फॉर ह्यूमन राइट्स (एसएएटीएच) फोरम के बैनर तले समूह में अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी एवं अन्य शामिल हैं।

एसएएटीएच फोरम ने आरोप लगाया कि ‘‘गैर निर्वाचित लोग पाकिस्तान के संविधान के ऐतिहासिक 18वें संशोधन पर शंका जाहिर कर रहे हैं’’ जो हमें बचे खुचे लोकतांत्रिक अधिकारों से भी दूर ले जायेगा। प्रख्यात पाकिस्तानी लोकतंत्र समर्थकों के अनुसार संविधान का 18वां संशोधन देश के चार संघीय ईकाइयों में रह रही पाकिस्तानी जनता की इच्छा और 1973 की मूल भावना को दर्शाता है। समूह ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश देश के संविधान से छेड़छाड़ की कोशिश कर रहे हैं।

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