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हमारी लड़ाई न्यायपालिका और मीडिया से है – मनोज सोशलिस्ट, सामाजिक न्याय मोर्चा

manoj socialistपिछले कुछ वर्षों में यूपी लोकसेवा आयोग में त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था को लेकर चर्चा में आया सामाजिक न्याय मोर्चा एक बार फिर सशक्त आंदोलन की अगुवाई कर रहा है। इस बार इसके निशाने पर न्यायपालिका और मीडिया है। सामाजिक न्यायमोर्चा ज्यादातर ग्रामीण परिवेश से आए हुए सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों का समूह है। जो समान विचारधारा के कारण एक बड़े समूह के रूप में इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहा है। सामाजिक न्यायमोर्चा के प्रमुख लोगों में मनोज सोशलिस्ट, अनिरुद्ध सिंह, राजकुमार यादव, नरेंद्र प्रताप, राजेश भारती, अजीत पटेल, राजेश गौतम और विपिन कुशवाहा जैसे लोगों की एक लंबी श्रृंखला है। इलाहाबाद से शुरू हुए और पूरे प्रदेश में तेजी से फैल रहे इस आंदोलन के अगुवाई करने वाले मनोज से न्यूज-85 ने विस्तार से बातचीत की है। मनोज सोशलिस्ट मूलरूप से गाजीपुर जिले के रहने वाले हैं। पेश है इसके संक्षिप्त अंश-
सामाजिक न्याय मोर्चा का गठन कब और क्यों किया गया?
मनोजः सामाजिक न्याय मोर्चा का गठन मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की मांग को लेकर 1989 में की गई थी। उस समय इसका नेतृत्व कर रहे छात्र नेताओं में कृष्ण मूर्ति सिंह, राम वृक्ष यादव ने शुरूआत की थी। बाद में समाजवादी पार्टी के गठन के बाद इस न्यायमोर्चा के बहुत से साथी समाजवादी पार्टी से अन्य राजनीतिक दलों में चले गए। दो साल पहले त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था को लेकर हो रहे आंदोलन की अगुवाई मोर्चे ने की थी। चार दिन पहले लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव के खिलाफ आए हाईकोर्ट के आदेश ने प्रतियोगी छात्रों को एक बार फिर से आंदोलित कर दिया है, जिसका नेतृत्व सामाजिक न्यायमोर्चा कर रहा है।
इस मोर्चे की क्या हैं प्रमुख मांगें?
मनोजः मोर्चे की प्रमुख मांग है कि मंडल कमीशन की सिफारिशों को पूरी तरह से जल्द लागू किया जाए। न्यापालिका में कोलेजियम सिस्टम को खत्म किया जाए। न्यायिक आयोग का गठन करके न्यायपालिका में एससी, ओबीसी और एसटी के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। मीडिया की सवर्णवादी मांसिकता के खिलाफ जल्द ही सख्त और कठोर कार्रवाई की जाए।
आंदोलन का तरीका क्या है? इसके पूरा होने में बाधाओं से कैसे निपटेंगे ?
मनोजः हमारी लड़ाई मुख्य रूप से न्यापालिका और मीडिया से है। चूकि इस आंदोलन में गरीब और मध्यम वर्ग के लोग शामिल है, इस लिए कोई बड़ा और खर्चीला अभियान न चलाकर आरटीआई के माध्यम से साक्ष्य जुटाते हैं। उसे जनता के सामने लाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही अपने आंदोलन के संबंध में पर्चे छपवाकर सक्रिय समूह में इसे वितरित किया जाता है।
आरोप है कि अनिल यादव ने 56 यादव एसडीएम की नियुक्ति कर दी है? कितनी सच्चाई है।
जी हां, हमने भी मीडिया में यह अफवाह सुनी है। यह भ्रमक खबर उड़ाई जा रही है। मुझे ऐसी बात करने वालों पर हंसी आती है कि शायद उन्होंने कभी भी लोकसेवा आयोग में एसडीएम के पदों को नहीं देखा है। अनिल यादव के कार्यकाल में अब तक तीन सालों की परीक्षाओं में केवल 12 एसडीएम यादव बने हैं। और 56 एसडीएम की पोस्ट किसी भी साल आई ही नहीं है। ये राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (आरएसएस), सवर्ण मांनसिक्ता के लोग और मीडिया की देन है जो इस तरह की गलत जानकारी देकर अनिल यादव को लोक सेवा आयोग के पद से हटाना चाहते हैं।
अनिल यादव को अपराधी घोषित करने का काम किया जा रहा है। ऐसे का आप साथ क्यों दे रहे हैं?
मनोजः अनिल यादव के बारे में जो भी मीडिया द्वारा या न्यापालिका द्वारा कहा जा रहा है वह पूरी तरह सवर्ण मांनसिकता की साजिश है। जबकि सच्चाई ये है कि अपने दो साल के अल्प अवधि में अनिल यादव ने यूपी के लोक सेवा आयोग के कार्यकलापों को न केवल सुधारने का काम किया, बल्कि प्रतियोगी छात्रों के हित में बहुत से दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय लिए हैं। अनिल यादव ने पीसीएस परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए रैंडम रोल नंबर देने की व्यवस्था की। कई स्कूल जो अपने यहां परीक्षा का सेंटर फिक्स करवा कर मनमाने तरीके से नकल करवाते थे, अनिल यादव ने ऐसे सेंटर पर पूरी तरह से रोक लगाते हुए एक शहर के छात्रों को दूसरे शहर में परीक्षा देने के लिए नई प्रणाली लागू की। उन्होंने स्केलिंग पद्धति को लागू कर पीसीएस परीक्षा में पूरी तरह से पारदर्शिता लाने की कोशिश की। कई साल पीछे चल रही पीसीएस परीक्षा को समय से करवाने और समय से उसका परिणाम घोषित करने का श्रेय भी अनिल यादव को जाता है। लोकसेवा आयोग के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि इसका अध्यक्ष खुद किसी इंटरव्यू बोर्ड में न बैठा हो। कई दर्जन इंटरव्यू बोर्डों का गठन कर परिणाम घोषित करने के बाद भी अनिल यादव  खुद साक्षात्कार लेने में शामिल नहीं रहे।
 
अनिल यादव का ही इतना विरोध क्यों हो रहा है, इसके पहले के आयोग के अध्यक्षों क इस तरह से विरोध नहीं हुआ?
मनोजः ऊपरी तौर पर यह आरोप सही लगता है, लेकिन जब आप गहराई में जाएंगे तो यूपी में सभी नियुक्तियों को करने वाले आयोग और बोर्डों को देखेंगे तो पाएंगे कि जब-जब किसी भी आयोग ने कोई दलित या पिछड़ा अध्यक्ष हुआ है, तब तब सवर्ण मांनसिकता के लोगों ने उसे काम नहीं करने दिया है और उसका विरोध कर उसे हटाने की साजिश की। अनिल यादव भी सवर्ण जातियों की इसी मांनसिकता के शिकार हो रहे हैं।

 

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