जानिये, सहारा-बिड़ला से रिश्वत लेने के मामले में, मोदी के खिलाफ क्यों नहीं होगी जांच ?

News85 January 12, 2017 0

modi-naनई दिल्ली,  सर्वोच्च न्यायालय ने  उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि इस आरोप की जांच होनी चाहिए कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिड़ला और सहारा समूह से रिश्वत ली थी। यह याचिका गैरसरकारी संस्था कॉमन कॉज ने दाखिल की थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने, सहारा और बिड़ला कारोबारी घरानों में हुई छापेमारी के दौरान जब्त कुछ दस्तावेजों के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं अन्य के खिलाफ रिश्वतखोरी के आरोपों की अदालत की निगरानी में एसआईटी जांच कराने की मांग करने वाली अर्जी 11 जनवरी को खारिज कर दी। न्यायालय ने कहा कि छापेमारी में बरामद दस्तावेजों की सबूत के तौर पर कोई अहमियत नहीं है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि इधर-उधर के पन्नों, कागजात, ई-मेल प्रिंट आउट जैसी ‘कहीं-कहीं की सामग्रियों’ पर आधारित मामला ‘महत्वरहित’ है, क्योंकि वे ‘अस्वीकार्य सामग्रियां’ हैं जिनकी ‘कानून के तहत सबूत के तौर पर इतनी अहमियत नहीं’ है कि प्राथमिकी दर्ज की जाए या जांच के आदेश दिए जाएं, वह भी ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे ऐसे पदाधिकारियों के खिलाफ, जिनके नाम का इन दस्तावेजों में जिक्र है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि आयकर निपटारा आयोग ने इन दस्तावेजों को प्रथम दृष्टया ‘गढ़ा हुआ’ करार दिया है।न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय की नई पीठ ने आज इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने कहा कि उच्च पदाधिकारियों के खिलाफ जांच की मांग करने वाले मामलों को निपटाते वक्त ‘अदालतों को चौकस रहना है’, क्योंकि इस मामले में कोई ‘ठोस सामग्री’ या सामग्री से मिलते-जुलते ‘स्वतंत्र साक्ष्य’ नहीं हैं कि जांच के आदेश दिए जाएं। नई पीठ का गठन इसलिए किया गया क्योंकि वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने तत्कालीन भावी प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ से मामले की सुनवाई से अलग हो जाने की मांग की थी । प्रशांत ने कहा था कि चूंकि खेहड़ के प्रधान न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति की फाइल प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कार्यपालिका के पास लंबित है, इसलिए उन्हें इस मामले की सुनवाई से अलग हो जाना चाहिए। एनजीओ की याचिका खारिज करते हुए न्यायालय ने कहा, ‘कुछ ठोस, भरोसेमंद और स्वीकार्य साक्ष्य’ होने चाहिए । वरना छुपे हुए लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा सकता है।
‘इधर-उधर के पन्नों’ से असंतुष्ट पीठ ने कहा कि एनजीओ ‘कॉमन कॉज’ की ओर से रिकॉर्ड पर लाई गई सामग्रियों का रखरखाव दोनों कारोबारी घरानों द्वारा नियमित कारोबार के दौरान नहीं किया जाता था। एनजीओ ने दावा किया था कि वे पन्ने सहारा ग्रुप और आदित्य बिड़ला ग्रुप की डायरियों की प्रविष्टियों का हिस्सा थे जिसमें ‘गुजरात सीएम’ और अन्य नेताओं जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। न्यायालय की एक अन्य पीठ ने पहले इन पन्नों और अन्य सामग्री को जांच का आदेश देने के लायक ‘शून्य सामग्री’ करार दिया था। पीठ ने कहा, ‘रिकॉर्ड पर लाई गई सामग्रियों और तथ्यों एवं परिस्थितियों की संवेदनशीलता को देखते हुए महत्व पर आधारित कोई मामला नहीं बनता कि विभिन्न राजनीतिक पदाधिकारियों, अधिकारियों वगैरह के खिलाफ जांच के आदेश दिए जाएं। अंतरिम आवेदनों को महत्वरहित पाया गया और इसे खारिज किया जाता है।’ न्यायालय ने सहारा ग्रुप के मामले में आयकर निपटारा आयोग की ओर से पारित आदेश का भी हवाला दिया और कहा कि आयोग ने भी सहारा के यहां से जब्त किए गए दस्तावेजों को प्रथम दृष्टया सही नहीं माना है और उसे गढ़ा हुआ कहा है ।

अदालत ने कहा, अगर हम बिना ठोस साक्ष्य के प्रस्तुत सामग्री के आधार पर जांच का आदेश देते हैं, तो संवैधानिक पदाधिकारियों का काम करना मुश्किल हो जाएगा, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा। अदालत ने कहा, जिस स्थिति में इन दस्तावेजों को एकत्र किया गया है और अदालत में प्रस्तुत किया गया है, उस पर हमारी राय है कि यह समुचित जांच के आदेश जारी करने लायक नहीं है।

 

 

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