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बुंदेल खंड- पानी की कमी से दम तोड़ रहे लोग और जानवर, सरकारी कागजों मे सब ठीक..?

नई दिल्ली, हाल के वर्षों में पेयजल संकट के संदर्भ में बुंदेलखंड क्षेत्र बार-बार चर्चित होता रहा है। पर इस बार तो स्थित और अधिक खराब है। उत्तर प्रदेश के सात और मध्यप्रदेश के छह जिलों में फैले बुंदेलखंड के हर हिस्से का हाल एक जैसा है। तालाब मैदान में बदल गए है, कुएं सूख चुके है, हैंडपंपों में बहुत कम पानी बचा है। कई स्थानों पर टैंकरों से पानी भेजना पड़ रहा है, तो जिन जलस्रोतों में थोड़ा पानी बचा है, वहां सैकड़ों की भीड़ लगी होना आम बात है।

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बुंदेलखंड में पानी का संकट धीरे-धीरे विकराल रूप लेता जा रहा है, अब तो बात हैंडपंप पर कतार, कई किलोमीटर दूर से पानी लाने से आगे निकलकर मौत तक पर पहुंचने लगी है। पानी की चाहत में जहां इंसान की जान जा रही है, वहीं जंगल में पानी न होने पर प्यास से जानवर मर रहे हैं।  पानी की चाहत में मारपीट, खून बहना तो आम बात हो चली है।

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मई का महिना पूरा गुजरने के बाद अधिकांश जलस्रोत सूखने के करीब हैं, तालाबों में न के बराबर पानी है, कुएं सूखे है, हैंडपंपों में कड़ी मशक्कत के बाद पानी निकल रहा है। आदमी तो किसी तरह पानी हासिल कर ले रहा है, मगर जंगली जानवर और मवेशियों को प्यास बुझाना आसान नहीं है।  एक तरफ इंसानों में पानी को हासिल करने की जददोजहद जारी है, तो दूसरी ओर जंगलों में जानवर परेशान हैं। जंगलों के जलस्रोत बुरी तरह सूख चुके हैं, यही कारण है कि मवेशी और जंगली जानवर पानी के अभाव में मर रहे हैं।

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बुंदेलखंड के किसी भी हिस्से में किसी भी वक्त जाने पर हर तरफ एक ही नजारा नजर आता है और वह है, साइकिलों पर टंगे प्लास्टिक के डिब्बे, जलस्रोतों पर भीड़, सड़क पर दौड़ते पानी के टैंकर, पानी के लिये तरसती आंखे वह चाहे मनुष्य की हो या जानवर की। मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के 13 ज़िलों में फैले बुंदेलखंड में विशेषकर पठारी व पथरीले गांव इस समस्या से अधिक त्रस्त हैं।

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वैसे गांव में हैंडपंप भी हैं और कुंए भी पर उनमें पानी नहीं है।  गांव के तालाब सूख चुकें है। दूर से कोई बैलगाड़ी से, कोई साईकिल से, कोई बहंगी से पानी लाते हैं। इक्का दुक्का हैंडपंप जो थोड़ा बहुत पानी दे रहें हैं, उनके साथ भी बड़ी समस्या है। इन  हैंडपंप के पानी में लौह तत्व की अधिकता है। यह भी एक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण है। सबसे बड़ी समस्या यहां वृद्ध, बीमार , असहाय जीवन जी रहे लोगों के साथ है कि वह दूर के कुंओं से पानी कैसे लाएं।

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पूरा दिन तो पानी के इंतज़ाम में ही गुज़र जाता है। कोई क्या कमाए तो क्या खाए?  दिन-रात बड़ी चिंता बनी रहती है कि पानी का इंतज़ाम कैसे करें। लोगों में आपस में झगड़े पहले पानी लेने के लिए  भी हो जाते हैं। अभी रात का अंधेरा दूर भी नहीं होता कि लोग पानी की खोज में निकल पड़ते हैं.अनेक लोग भीषण गर्मी में भी पानी की कमी के कारण दो-तीन दिन में ही नहाते हैं या कपड़े धोते हैं। किसी भी दिन पानी लाने में घंटों लग जाते हैं तो आजीविका पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

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दूषित पानी का उपयोग भी करना पड़ता है जिससे कभी त्वचा रोग तो कभी उल्टी-दस्त की बीमारी होती है। दूषित पानी से बीमारी होती है तो महंगा इलाज कराते हैं व रोजी-रोटी में भी कठिनाई होती है।  खुजली के अतिरिक्त उल्टी-दस्त की कई बार शिकायत विशेषकर बच्चों में रहती है। इस कारण कुछ वर्ष पहले कुछ बच्चों की मौत भी हुई । कई स्थानों पर रास्ते इतने दुर्गम है कि किसी बीमार व्यक्ति को इलाज के लिए ले जाना बहुत कठिन है।

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पेयजल संकट का  सामाजिक पक्ष भी है। बुंदेलखंड क्षेत्र मे सबसे ज्यादा पानी का संकट दलितों- पिछड़ों व कमज़ोर वर्गों के साथ है। य़े तबका सामाजिक और आर्थिक असामानता को झेलने के साथ- साथ पानी की कमी से भी सबसे ज्यादा जूझ रहा है।  ऊंची

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जातियों के नियंत्रण के जल- स्रोतों से पानी लेना दलित -पिछड़ी जातियों के लिए बहुत ही कठिन है। जान तक का जोखिम रहता है।

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बुंदेलखंड मे आम आदमी की जिंदगी पूरी तरह पानी के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है, मगर सरकार और प्रशासन यही दावे कर रहे हैं कि इस क्षेत्र के 70 प्रतिशत से ज्यादा हैंडपंप पानी दे रहे हैं। सच्चाई पर पर्दा डालने की इस कोशिश से लोगों में सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, पर बुंदेलखंड मे जल-संकट पहले  से ज्यादा विकट होता जा रहा है।

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