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अब यादवों की पीठ गढ़वाघाट मे सीएम योगी का दौरा, आखिर क्या है बीजेपी की मजबूरी

लखनऊ,   चार दिन पहले ही   सारनाथ मे आयोजित यादव युवाओं की एक संगोष्ठी मे बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बंसल ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की और आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी में अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान यादवों की पीठ गढ़वा घाट स्थित आश्रम  पहुंच गए. क्या  यह सब अनायास है, या इसके पीछे है बीजेपी की सोची समझी रणनीति ?

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज वाराणसी में अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान यादवों की पीठ गढ़वा घाट स्थित आश्रम  गए. योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी दौरे के दूसरे दिन की शुरूआत ‘संपर्क फॉर समर्थन’ से की. गढ़वा आश्रम पहुंच कर योगी आदित्यनाथ ने सद्गुरु शरणानंद परमहंस महाराज से मुलाकात की.

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उन्होंने उनसे मोदी सरकार द्वारा किए गए विकास की चर्चा की और चार साल की उपलब्धियों पर तैयार बुकलेट भी सौंपी. उन्होंने आश्रम में गायों को अपने हाथ से हरा चारा भी खिलाया. 2017 विधानसभा चुनावों के समय  पीएम नरेंद्र मोदी भी  यादवों का गढ़ माने जाने वाले गढ़वा घाट आश्रम पर विशेष तौर पर गए थे. यहां उन्होंने गायों को चारा खिलाया और मंदिर में शीश नवाया था. पीएम का इस आश्रम में आना एक राजनितिक रणनीति का हिस्सा था.

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 महज  चार दिन पहले ही वाराणसी  मे  बीजेपी ने सारनाथ इलाके में पूर्वांचल युवा संगोष्ठी का आयोजन किया था. गोष्ठी का विषय “समृद्धि की ओर बढ़ते भारत में हमारी भूमिका” जरूर था, लेकिन इसमें शामिल होने के लिए पूर्वांचल के यादव युवाओं को खासतौर से बुलाया गया था. गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में यूपी बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बंसल मौजूद थे. इस गोष्ठी में यादव युवाओं तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किस तरह देश सभी को साथ लेकर तरक्की कर रहा है, यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई.

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 दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी अपनी जातिगत गणित को साधने में जुट गई है. हाल ही में हुए लोकसभा उप-चुनावों में गोरखपुर, फूलपुर और अब कैराना हाथ से निकलने के बाद बीजेपी लीडरशिप कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती है. इसी को ध्यान में रखते हुए वाराणसी और आसपास के जिलों में दलित, पिछड़ा और मुस्लिम वोट बैंक बीजेपी के लिए बहुत मायने रखता है.

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साल 2014 के चुनावों में बीजेपी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दलितों- पिछड़ों के बड़े वोट बैंक को अपने पाले में कर लिया था. अब बारी है खासतौर से यादव वोटर को अपने पक्ष में खड़ा करने की. यूपी मे यादव सबसे अधिक जनसंख्या वाली जाति है. जिसकी दम पर समाजवादी पार्टी से बीजेपी को लोकसभा चुनाव मे कड़ी टक्कर मिलने की संभावना है. केवल पीेम मोदी के वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में ही यादव वोटरों की संख्या लगभग ढाई लाख की है.

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मोदी सरकार के चार साल और योगी सरकार के एक साल के कार्यकाल मे यादवों को सत्ता मे हाशिये पर रखा गया है. केद्र की मोदी और यूपी की योगी सरकार मे एक भी कैबिनेट मंत्री नही है. यूपी मे तो मात्र एक राज्यमंत्री गिरीश यादव हैं. अपराध के नाम पर यादव युवाओं का एन्काउंटर, जाति के नाम पर भेदभाव , यादव अफसरों का जांच के नाम पर उत्पीड़न आदि एेसे मुद्दें हैं, जो बहुतायत यादव समाज को बीजेपी से अलग करता है.

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एेसे मे अगर यादव समाज का पूरा का पूरा वोट सपा-बसपा गठबंधन को ट्रांसफर हो जाता है तो यूपी से ही केंद्र में सरकार बनाने का बीजेपी का सपना टूट सकता है. इसलिए अब बीजेपी ने एक सोची समझी रणनीति के तहत अपना पूरा ध्यान इस ओर लगा रखा है कि भी है कि किस तरह यादवों के वोटों मे सेंध लगायी जाये.  गुरुवार को हुई गोष्ठी में बड़ी संख्या में यादव युवाओं को बुलाकर उन्हें मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के खिलाफ भड़काना और आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यादवों की पीठ गढ़वाघाट आश्रम जाना बीजेपी की इसी रणनीति की ओर इशारा कर रहा है.

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