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सवर्ण आरक्षण से दलितों-पिछड़ों मे भड़का आक्रोश, इन पार्टियों ने किया विरोध

लखनऊ, मोदी सरकार द्वारा सवर्णों को आर्थिक आधार पर शिक्षा और नौकरियों में 10% आरक्षण देने संबंधी संविधान संशोधन बिल को सदन में पेश करने को लेकर, दलितों और पिछड़ों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त हो गया है। दलित और पिछड़ों नेताओं ने इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताते हुये आंदोलन छेड़ने की बात कही है।

केंद्र ने सवर्णों का आर्थिक आधार पर शिक्षण नौकरियों में 10% आरक्षण देने से जुड़ा 124 वां संविधान संशोधन बिल आज सदन में पेश किया। इसे लेकर दलितों और पिछड़ों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त हो गया है। सदन में डीएमके ने इस बिल का विरोध किया है। वहीं सवर्णों को आरक्षण दिए जाने को लेकर राजद नेता तेजस्वी यादव ने तंज कसते हुये कहा कि यदि मोदी जी गरीबों की गरीबी दूर करना चाहतें हैं तो क्यों नही वादे के अनुसार, उनके खाते मे 15-15 लाख रूपये डाल देतें हैं।

वहीं सवर्णों को आरक्षण दिए जाने को लेकर मायावती ने कहा है कि आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था काफी पुरानी हो चुकी है इसलिए एससी एसटी और ओबीसी को उनकी आबादी के अनुपात से आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। वास्तव मे मायावती ने दलितों- पिछड़ों को मिल रहे आरक्षण को बढ़ाने की बात कही है।

प्रमुख दलित व पिछड़े नेताओं ने मोदी सरकार के फैसले को दलित और पिछड़ा विरोधी बताया है उन्होंने कहा की नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक शैक्षिक ट्रस्ट विभिन्न को ध्यान में रखकर संविधान द्वारा दिया गया है मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में दलितों पिछड़ों के लिए कोई भले का तो काम किया नहीं लेकिन अब वह सवर्णों को आरक्षण देकर आरक्षण की मूल भावना को समाप्त कर रहे हैं।

पिछड़े वर्ग के नेता और बैकवर्ड ब्रिगेड के प्रमुख अशोक यादव ने कहा कि मोदी सरकार ने सवर्णों को आरक्षण देने की बात उठाकर दलितों और पिछड़ों के साथ अन्याय किया है, जिसका परिणाम उसे लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा। उन्होने कहा कि दलितों-पिछड़ों के द्वारा जल्द ही सरकार के विरोध मे जन जागरण अभियान शुरू होगा।

पिछड़े वर्ग के वरिष्ठ नेता वीरेंद्र मौर्य ने कहा कि संविधान में सामाजिक व शैक्षिक रुप से पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्राविधान है। मात्र आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान नहीं है और निश्चित रूप से यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।  मोदी सरकार संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 15,  16 में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान जोड़ने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने कहा कि अगर मोदी सरकार आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की मदद करना चाहती है तो उसे गरीबी हटाओ अभियान जैसे कुछ कार्यक्रम चलाने चाहिए। जिससे गरीब लोगों की आर्थिक मदद हो सके आरक्षण देकर वह आरक्षण की मूल भावना को समाप्त कर रही है।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अनुराग यादव ने कहा कि सवर्ण आरक्षण की बात करके मोदी सरकार ने एक नए संघर्ष को शुरू कर दिया है। कोर्ट द्वारा लगाई गई 50 परसेंट से अधिक आरक्षण ना होने की पाबंदी भी, सवर्णों को आरक्षण देने से समाप्त हो जाएगी, जिससे दूसरे वर्ग भी अपना आरक्षण बढ़ाने की मांग करेंगे।

अब जहां पिछड़ा वर्ग अपनी आबादी के अनुपात में 54 परसेंट आरक्षण की मांग करेगा । वहीं सवर्णों को आरक्षण दिए जाने के बाद, धार्मिक आधार पर आरक्षण देने की भी मांग उठेगी। मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म के लोग भी धार्मिक आधार पर आरक्षण की मांग करेंगे जो कि आने वाली सरकार के लिए एक बड़ी समस्या होगी। अभी अनुसूचित जाति को 15% अनुसूचित जनजाति को 7. 5% और अन्य पिछड़े वर्ग को 27% आरक्षण दिया जा रहा है।

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