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आखिर, क्यों करते हैं बच्चे शिकायत

मम्मा देखो यह मुझे डॉल से खेलने नहीं दे रहा, इसने मेरी बुक फाड़ दी, यह मुझे चिढ़ा रहा है…पेरेंट्स को अकसर ऐसी शिकायतों से रूबरू होना पड़ता है, पर कुछ बच्चों को बेवजह हर बात पर बड़ों से शिकायत करने की आदत पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में यह समझना बहुत जरूरी है कि बच्चे को वास्तव में कोई परेशानी है या उसकी आदत ही ऐसी है। स्वाभाविक है यह: दो-ढ़ाई साल की उम्र से ही बच्चों में ऐसी आदतें दिखने लगती हैं। यह उनके भावनात्मक विकास का जरूरी हिस्सा है। इस उम्र से ही बच्चों में अधिकार की भावना विकसित हो जाती है। वे किसी के साथ अपनी चीजें शेयर नहीं करना चाहते। इसी उम्र में खुद से उनका जुड़ाव होता है।

जब भी उन्हें ऐसा लगता है कि कोई दूसरा उन्हें नुकसान पहुंचाने वाला है तो वे शोर मचा कर विरोध प्रदर्शित करते हैं। उनका ऐसा व्यवहार सुरक्षा की दृष्टिड्ढ से बेहद कारगर साबित होता है, लेकिन दिक्कत तब होती है जब बच्चे बेवजह छोटी बातों पर नाराज होकर शिकायत करते हैं या पांच साल की उम्र के बाद भी उनमें यही आदत बनी रहती है।

क्या है असली वजह: दरअसल छोटे बच्चे स्थितियों और व्यवहार से जुड़ी बारीकियों को समझने में असमर्थ होते हैं। उनके लिए कोई भी बात पूरी तरह सही या गलत होती है। सही-गलत के काले-सफेद रंगों के बीच मौजूद ग्रे शेड को पहचानकर उसके अनुकूल व्यवहार करने की क्षमता इतनी छोटी उम्र में विकसित नहीं होती। भाई-बहनों और दोस्तों से छोटी-छोटी शिकायतें करते हुए ही बच्चे सही-गलत की पहचान करना सीखते हैं। इसी के साथ उनमें नैतिकता की भावना विकसित होती है। खेलकूद के दौरान होने वाले छोटे-छोटे झगड़ों से भी कई ऐसी बातें सीखने को मिलती हैं, जो ताउम्र उसके काम आती हैं। ऐसे में उसे आपके सहयोग की जरूरत होती है।

आप उसे समझाएं कि छोटी-छोटी बातों के लिए मम्मी-पापा से शिकायत नहीं करनी चाहिए। अगर किसी दोस्त से तुम्हारा झगड़ा हो तो उसे खुद सुलझाने की कोशिश करो। हां, जब भी तुम्हें किसी से डर लगे या कोई खतरा महसूस हो तो हमें जरूर बताओ। कैसे निबटें शिकायतों से: सबसे पहले बड़ों को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्या सचमुच उनके बच्चे को कोई परेशानी है? उसकी पूरी बात सुने बिना अपने आप यह मान लेना अनुचित है कि बच्चे तो ऐसा करते ही हैं। चाहे कितनी भी व्यस्तता हो, दो मिनट रुक कर धैर्यपूर्वक उसकी पूरी बात जरूर सुनें। ऐसा करना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार बच्चे सचमुच बहुत परेशान होते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए बड़ों का बीच में बोलना जरूरी होता है।

बच्चों में यह तय करने की क्षमता नहीं होती कि कौन सी स्थितियां उसकी सुरक्षा की दृष्टिड्ढ से नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। ऐसे में जो व्यक्ति बच्चों के साथ होता है, उसकी यह जिम्मेदारी बनती है कि उन पर नजर रखते हुए वह समझने की कोशिश करे कि उनके बीच खिलौनों के लिए मामूली छीना-झपटी हो रही है या मारपीट। कुछ बच्चों का व्यवहार बेहद आक्रामक होता है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आप अपने बच्चे को समझाएं कि तुम किसी से झगड़ा मत करना, लेकिन तुम्हें जब भी कोई खतरा महसूस हो तो आसपास मौजूद अंकल या आंटी को जरूर बताना।

समझदारी से बनेगी बात: यह सच है कि बच्चों के बीच होने वाले छोटे-छोटे झगड़े उनकी नासमझी की वजह से होते हैं। ऐसे में उन्हें बड़ों के सहयोग की जरूरत होती है। अगर कोई दूसरा बच्चा आपके बेटे से उसका मनपसंद खिलौना छीन लेता है और वह रोता हुआ आपके पास शिकायत लेकर आता है तो ऐसी स्थिति में आप उन दोनों को बारी-बारी से खेलने सलाह दे सकती हैं। अगर वे फिर भी न मानें तो वह खिलौना वापस मांग कर अपने पास रख लें और उनसे कोई दूसरा गेम खेलने को कहें। जब भी आपके बच्चे का किसी से कोई झगड़ा हो तो हल के रूप में उसके सामने कम से कम दो-तीन विकल्प जरूर रखें। इससे वह आसानी से अपने विवाद सुलझाना सीख जाएगा।

क्या है असली मंशा: पेरेंट्स के लिए बच्चे की असली मंशा समझना बहुत जरूरी है। कुछ बच्चे आठ-दस साल की उम्र तक पहुंचने के बाद भी हर बात के लिए माता-पिता के पास पहुंच जाते हैं या अपनी छोटी सी परेशानी को भी बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं। बच्चे की भलाई के लिए यह बेहद जरूरी है कि माता-पिता निष्पक्ष रूप से अपने उसकी खूबियों-खामियों का विश्लेषण करें। कुछ बच्चों को झूठी शिकायत करके अपने दोस्तों को डांट सुनवाने में मजा आता है तो कुछ बड़ों के सामने अच्छा इंप्रेशन बनाने के लिए भी भाई-बहनों की शिकायत करते हैं। कई बार वे दोस्तों पर रौब जमाने के लिए भी ऐसा करते हैं।

जिन बच्चों में दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने की आदत होती है, वे भी बेवजह चुगली करते हैं। अगर आपका बच्चा ऐसी वजहों से शिकायत करता है तो आप उसकी इस आदत को किसी भी हाल में बढ़ावा न दें। अगर आप पूरी बात जाने-समझे बिना उसकी हर शिकायत पर दूसरे बच्चों को डांटेंगी तो वह कभी भी अपनी समस्याएं सुलझाना सीख नहीं पाएगा। हां, अगर वह आपका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए ऐसा कर रहा हो तो उस वक्त आप भले ही उसकी बातों को नजरअंदाज कर दें, पर बाद में उसके साथ भरपूर क्वॉलिटी बिताएं और उसकी सारी बातें ध्यान से सुनें।

ठीक नहीं है मनमानी: केवल भाई-बहनों या दोस्तों के बीच मनमानी करने के लिए अगर वह आपसे शिकायत करता है तो उसकी ऐसी बातों को गंभीरता न लें। जब आपको ऐसा लगे कि सचमुच उसकी शिकायत जायज है तभी दूसरे बच्चे को टोकें। अगर आप अपने बच्चे की उम्र और मानसिक परिपक्वता को लेकर संतुष्टड्ढ हैं कि वह अपने झगड़े खुद सुलझा लेगा तो उसे और उसके साथ मौजूद दोस्तों को प्यार से समझा दें कि जब तक बहुत जरूरी न हो वे आपके पास कोई शिकायत लेकर न आएं।

पेरेंटिंग के मामले में यह समझना बहुत जरूरी है कि दो बच्चों के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर मामूली विवाद होना स्वाभाविक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि सिर्फ एक शरारत के आधार पर किसी बच्चे को आप हमेशा गलत समझें। छोटी सी गलती की वजह से कोई बच्चा हमेशा के लिए दोषी नहीं बन जाता। ऐसी स्थिति कुछ पेरेंट्स गलती नहीं करने वाले बच्चे को कुछ विशेषाधिकार सौंप देते हैं कि तुम अपने दूसरे भाई-बहनों पर निगरानी रखो। अगर वे गलती करें तो मुझे बताओ।

ऐसा करना ठीक नहीं है क्योंकि कई बार यही आज्ञाकारी बच्चे्य माता-पिता की शह पा पाकर भाई-बहनों पर बेवजह रौब जमाने लगते हैं, शिकायत की धमकी देकर वे कई बार भाई/बहन से अपने सारे काम करवा लेते हैं। इसलिए अगर घर में एक से ज्यादा बच्चे हैं तो सभी को समान रूप से अनुशासित करने की जिम्मेदारी माता-पिता की होनी चाहिए। अपने एक बच्चे को दूसरे का अभिभावक न बनने दें। इससे कोई भी अनुशासित नहीं होगा। इतना ही नहीं इसकी वजह से बड़े होने के बाद भी उनके आपसी रिश्ते में कटुता पैदा हो सकती है। अंत में, पेरेंट्स को सिर्फ यही याद रखना चाहिए कि बच्चों का शिकायत करना स्वाभाविक है। ऐसे में आप धैर्यपूर्वक सच्चाई को समझने की कोशिश करें और उन्हें सही रास्ता दिखाएं।

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