एकलव्य यह देश शर्मिंदा है, द्रोणाचार्य अब तक जिंदा है….

dc mandal1RSS के बगलबच्चा संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP की शिकायत के बाद जब रोहित वेमुला समेत पांच छात्रों को हॉस्टल से जबर्दस्ती निकाला गया, तो अपने कमरे से ‘खतरनाक सामान’ यानी बाबा साहेब और सावित्रीबाई फुले की तस्वीर लेकर वे बाहर आए. जिस बच्चे के हाथ में बाबा साहेब की तस्वीर है, वह रोहित है, जिसे RSS और प्रोफेसरों ने मिलकर आज मार डाला. गांव का रहने वाला एक बच्चा, तमाम तनाव, परिवार की महत्वाकांक्षा, अकेलेपन का बोझ झेल रहा होता है, और यूनिवर्सिटी उसके सामाजिक बहिष्कार का आदेश जारी कर देती है.

एकलव्य यह देश शर्मिंदा है,
द्रोणाचार्य अब तक जिंदा है.

Farrah Shakeb हैदराबाद विश्वविद्यालय में पी एच डी के छात्र रोहित की आत्महत्या अब यूनिवर्सिटीज़ में दलितों के मानसिक उत्पीड़न का स्टार्ट अप है क्या ..????

Pramod Kumar Pandey कातिलों की सख्त सजा हो । रोहित की शहादत , असमय चले जाना बेहद तकलीफदेह है। शमर्नाक समय और सोच है यह ।

Avinash Gadve कोई मौज नही थी आत्महत्या करना ! कितना डिप्रेशन में रहा होगा वो बच्चा जिसकी माँ सिलाई करती थी और पिता अस्पताल में काम करके उसे पढ़ा रहे थे । ये सही है कि उसे आत्महत्या नही करना था और मरने का इरादा कर ही लिया था तो मार के मरता

Balraj Kataria जब कोई होनहार, कोई कोमल सा लड़का कोशिश करता है कि उसका भी सर बुलंद रहे। संविधान में उसके जो हक़ हैं वो उसे मिले। पर जातिवाद की घृणित मानसिकता से बीमारग्रस्त कोई दल या नेता उसके हक़ पे डाका डाले, उसपे ज़ुल्म करे और वो मासूम सा लड़का हारकर खुदकुशी करले तो यह मौत उस लड़के की मौत नहीं है। यह लोकतंत्र का क़त्ल है। और जो भी इस मौत के ज़िम्मेदार हैं या कल को जो पुलिस या अदालत इनको बेक़सूर क़रार दे देगी वे सब के सब इस देश के गद्दार हैं।
नज़रिया अलग रखना कोई गुनाह नहीं है और उसको अगर खुदकुशी करके बचाना पड़े तो इस देश को क्या कहा जाए।
मुझे ऐसी सूरत मंज़ूर नहीं है और मैं बहुत परेशान हूं पर समझ में नहीं आ रहा क्या करूं।
लानत देता हूं इस मुल्क की महानता पर

Shambhu Kumar Singh ठाकुर साहब, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एबीवीपी की शिकायत पर बंगारू दत्तात्तेय ने मनुस्मृति मैडम को पत्र लिखा। शिकायत थी कि वो दलितों की बात करता था। सनातन धर्म के खिलाफ लिखता था, बोलता था, हां में हां नहीं मिलाता था। बस फिर क्या था बिना जांच, बिना कोर्ट, हॉस्टल से 5 दलित छात्रों को निकाल दिया गया। जिसके बाद संघर्ष करते-करते रोहित हार गया। सुसाइड नोट मिला है। अब देखिए ना कैसे मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। आपको तो मेरी सीरत पता है ना। मेरे वाला हाल था।

Jiten Baudha हमने भी रुटीन की घटनाओं में ही लिया था इस घटना को ।
अब क्या होगा उस मा का जो सिलाई सिखाकर
और बाप अस्पताल में गार्ड की नौकरी कर अपने जिगर के टुकडे को पी एच डी करा रहे थे ।

Milind Lokhande और भी घटनाए है जो पटल पर नही आती…..पर कब तक?….भाई एंड पॉईट तो होना ही चाहीए.कौन करेगा?…..क्या हम यु ही इन घटनाओ को पढकर स्किप करते रहेगे?…

फेसबुक पर दिलीप सी मंडल जी की वाल से साभार

 

 

 

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