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बहुजन समाज को जोड़ने की प्रक्रिया से बसपा हो रही विमुख

बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को एक बार फिर 6743 जातियों में बंटे दलित व पिछड़ा वर्ग के लोगों को एकजुट करने के लिए सड़क पर उतरकर आन्दोलन करना होगा, तभी संविधान विरोधी ताकतों को शिकस्त दी जा सकेगी, दुर्भाग्यवश कांशीराम जी के महानिर्वाण के बाद बहुजनों को एकजुट करने के लिए इस दिशा में कोई भी काम नहीं हुआ। बसपा के मौजूदा नेतृत्व के केवल अखबारों में बयान देने से बहुजनों का भला नहीं होने वाला है। मौजूदा नेतृत्व अपने निजी और पारिवारिक लाभ के लिए बहुजन समाज की मूल विचारधारा से दूर होता जा रहा है, जिस दलित, पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक समाज को एकजुट करके बहुजन नायक कांशीराम जी ने बहुजन समाज बनाया था, उनका मानना था कि जबतक बहुजन समाज के लोग सत्ता में नहीं काबिज होंगे तबतक उन्हें उनके संवैधानिक अधिकार नहीं मिलेंगे, बहुजन समाज को एकजुट करने ले लिए उन्होंने संविधान विरोधी ताकतों के खिलाफ 85 फ़ीसदी वंचित-शोषित समाज को एकजुट करने के लिए नारा दिया कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उनकी हिस्सेदारी। लेकिन मायावती जी ने पार्टी के इस मूल नारे को ही बदल दिया। इतना ही नहीं मायावती जी ने जिस तरह से सियासी दलों की प्रतिक्रियाओं पर दूसरे दिन ही अपने बयान को बदल दिया, उससे साफ़ है कि अब पार्टी भाजपा से कम सपा व कांग्रेस से ज्यादा लड़ रही है।

बहुजन नायक कांशीराम जी ने विभिन्न जातियों में बंटे शोषितों और वंचितों को एकजुट करके देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में सत्ता हासिल की, लेकिन जिस तरह से सत्ता की बागडोर सँभालते ही मायावती जी ने बहुजन को छोड़कर सर्वसमाज की बात शुरू की, उसके बाद से ही पार्टी में बहुजन समाज को जोड़ने की प्रक्रिया समाप्त हो गयी। इसी का नतीजा रहा कि कांशीराम जी के अथक प्रयास से जुड़ा बहुजन समाज धीरे-धीरे पार्टी से अलग होता चला गया और बहुजन समाज की विभिन्न जातियों के लोग बसपा से अलग होते चले गए, लेकिन मायावती जी ने विभिन्न जातियों के पार्टी छोड़कर जाने के कारणों की गहन समीक्षा नहीं की और कभी यह भी जानने की कोशिश भी नहीं की कि आखिर पार्टी से जुड़ा बड़ा वर्ग क्यों अलग हो रहा है। इतना ही नहीं बहुजन समाज के विभिन्न जातियों के नेताओं को पार्टी से जोड़ने की बजाय पार्टी में शामिल इन जातियों के कद्दावर नेताओं को तिरस्कृत व अपमानित करके पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यही वजह रही कि कुछेक नेताओं ने अलग दल बना लिया, जिनमें सोनेलाल पटेल और ओम प्रकाश राजभर रहे। वहीँ बसपा प्रमुख ने जिन नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखया उनमें से स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी, बलिहारी बाबू,केकेगौतम, दद्दू प्रसाद, दयाराम पाल, लालजी वर्मा, रामअचल राजभर, इन्द्रजीत सरोज जैसे कई नेताओं ने सपा का दामन थाम लिया। वहीं नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस मे शामिल हो गए।जबकि बसपा से उपेक्षित होने के कारण त्रिभुवन राम भाजपा मे शामिल हो गए।अपने अहंकार में बसपा प्रमुख ने बहुजन समाज की विभिन्न जातियों को पार्टी से जोड़ने की प्रक्रिया ही ख़त्म कर दी। वर्ष 2012 के बाद जबसे बसपा यूपी की सत्ता से बाहर हुईं हैं तबसे लेकर अबतक पार्टी का लगातार जनाधार गिर ही रहा है, लेकिन इन वर्गों को पार्टी से जोड़े रखने के बजाय हार के कारणों के पीछे कभी यह बताया गया कि मुस्लिमों ने वोट नहीं दिया, कभी कहा पिछड़ा वर्ग के लोगों ने वोट नहीं दिया, लेकिन इन वर्गों ने बसपा को वोट क्यों नहीं दिया इसपर बसपा नेतृत्व ने ना तो कभी आत्मचिंतन किया और ना ही पार्टी स्तर पर कभी कोई समीक्षा की गयी।

भाजपा के पहले शासनकाल के दौरान वर्ष 2017 में सहारनपुर जिले के शब्बीरपुर में हुई दलित उत्पीड़न की घटना के बाद यानि पांच साल पहले मायावती जी एक बार जरूर सड़क मार्ग के जरिये शब्बीरपुर गयीं तो उन्हें बहुजन समाज का व्यापक समर्थन भी मिला था, लेकिन उसके बाद से लेकर आजतक उन्होंने पार्टी मुख्यालय के बाहर किसी भी आन्दोलन या पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मलेन या सेमिनार आदि में शिरकत नहीं की। वैसे इस सम्बन्ध में सामाजिक संस्था बहुजन भारत के अध्यक्ष पूर्व आईएएस कुंवर फ़तेह बहादुर का कहना है कि वर्त्तमान में बसपा नेतृत्व ने बहुजन समाज की मूल विचारधारा से पूरी तरह से किनारा कर लिया है, बहुजन नायक कांशीराम जी ने बहुजन समाज की विभिन्न जातियों को एक साथ लाने का जो कार्यक्रम चलाया था, अब बहुजन समाज की विभिन्न जातियों को बसपा से जोड़ने का अभियान बंद कर दिया गया है, जिसकी वजह से बसपा का जनाधार लगातार कमजोर होता जा रहा है। दुर्भाग्यवश मायावती जी द्वारा इस पर कोई भी गहन समीक्षा नहीं की जा रही है, केवल वह सोशल मीडिया पर बयान देकर अपने कर्तव्य को इतिश्री कर रहीं हैं। इसी का परिणाम है कि वर्ष 2022 में यूपी में हुए विधानसभा के चुनाव में बसपा को महज एक सीट ही मिली इसके लिए बसपा नेतृत्व ही जिम्मेदार है। एक धर्म विशेष के लोगों ने वोट नहीं दिया या किसी जाति विशेष के लोगों ने बसपा को वोट नहीं दिया, यह कहना बेमानी है।

कमल जयंत (वरिष्ठ पत्रकार)।

 

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