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आर्थिक मंदी की वर्तमान स्थिति के लिए , गोविंदाचार्य ने इनको ठहराया जिम्मेदार

नयी दिल्ली,  जाने माने चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने आर्थिक मंदी की वर्तमान स्थिति के लिए उदारीकरण की तीन दशकों की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है और कहा है कि मौजूदा आर्थिक नीति की समीक्षा करके घरेलू उत्पादन एवं उपभोग पर आधारित प्रकृति के संरक्षण पर केन्द्रित नीतियों को अपनाया जाये।

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक श्री गोविंदाचार्य ने एक संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही।

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उन्होंने कहा कि वह उदारीकरण की नीति को आगे बढ़ाने के लिए किसी एक नेता या सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराएंगे लेकिन मौजूदा हालात में वक्त की मांग है कि 1991 में अपनायी गयीं आर्थिक नीतियों की समीक्षा की जाये।

उन्होंने कहा कि विकास का पैमाना सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को मानने से विषमता दूर नहीं हो रही है, उलटा विषमता बढ़ती जा रही है। इसे रोकने के लिए सोच को बदलना होगा।

उन्होंने कहा कि उदारीकरण के कारण घरेलू बाजार कमजोर हुए हैं और खेती पर बुरा असर पड़ा है जिससे रोजगार कम हुए।

देश की 56 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर होने के बावजूद जीडीपी में कृषि का योगदान 16 प्रतिशत मात्र है।

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इसे देखते हुए सरकार को अब जीडीपी आधारित विकास की अवधारणा को त्याग कर घरेलू उत्पादन और उपभोग के आधार पर भारत की आर्थिक नीतियां बनायी जानी चाहिए और ये नीतियां प्रकृति का संपोषण को विकास मानने वाली हों।

उन्होंने कहा कि देश में कृषि आधारित उद्योगों पर ध्यान देना होगा।

देश में दलहन एवं तिलहन के उत्पादन को बढ़ाना चाहिए।

इससे पहले राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संयोजक पवन श्रीवास्तव ने कहा कि आंदोलन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की कल बैठक होगी जिसमें देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति और जम्मू कश्मीर को लेकर कश्मीर हमारा, कश्मीरी भी हमारे, अभियान की समीक्षा की जाएगी।

इसके अलावा देश में आसन्न पेयजल संकट एवं उसके समाधान को लेकर भी जारी अभियान पर चर्चा होगी।

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उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का मानना है कि प्राणियाें की प्यास बुझाने के लिए पेयजल का व्यावसायीकरण अनैतिक और पाप है।

पेयजल के व्यापार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

श्री श्रीवास्तव ने कहा कि पेयजल को बाजार के हवाले करने के दुष्परिणाम आने लगे हैं।

शुद्ध जल का अभाव, प्रदूषण आदि संकटों को पैदा करने में बाजार की भूमिका है।

सभी नागरिकों को शुद्ध पेयजल निशुल्क उपलब्ध कराना सरकार का कर्तव्य है।

प्यास बुझाने के लिए पैसा देना अस्वीकार्य है।

उन्होंने कहा कि सरकार को इसके लिए एक साल का समय दिया जाएगा और यदि उस दौरान कुछ नहीं हुआ तो सभी सरकारी एवं गैरसरकारी बॉटलिंग प्लांट का घेराव किया जाएगा।

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