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यूरोपियन संघ के सांसदों को कश्मीर ले जाने को लेकर उठ रहे ये खास सवाल ?

यूरोपियन संघ के सांसदों को कश्मीर ले जाने के लिये, भारत सरकार को  इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर कहने वाली मादी (मधु) शर्मा का सहारा लिया है? इस बात का खुलासा, मादी शर्मा के द्वारा सात अक्तूबर को भेजे गए, ब्रिटेन के लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद क्रिस डेवीज़ की ने ईमेल किया है.  मादी शर्मा का एक एनजीओ है. WESTT women’s economic and social Think Tank. इस एनजीओ की तरफ से वे सांसदों को ईमेल करती हैं और लिखती हैं कि आने जाने का किराया और ठहरने का प्रबंध दूसरी संस्था  International Institute for Non-Aligned Studies करेगी.

यूरोपियन संघ के सांसदों को बुलाकर कश्मीर ले जाने के लिए भारत ने अनौपचारिक चैनल (इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर) क्यों चुना?

निर्गुट आंदोलन के लिए बनी यह संस्था यूरोपियन संघ के 27 सांसदों का किराया क्यों दे रही है ?

जो सांसद बुलाए गए हैं वो धुर दक्षिणपंथी दलों के हैं. इनमें कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिनकी सरकार हो या प्रमुख आवाज़ रखते हों. यूरोपियन संघ के 751 सीटों में से ऐसे सांसदों की संख्या 73 से अधिक नहीं है. तो भारत ने कश्मीर पर एक कमजोर पक्ष को क्यों चुना?

क्या प्रमुख दलों से मन मुताबिक़ साथ नहीं मिला? अमरीकी सिनेटर को कश्मीर जाने की अनुमति न देकर भारत ने इस मामले में अमरीकी दबाव को ख़ारिज कर दिया. फिर भारत को इन सांसदों को बुलाने की भूमिका क्यों तैयार करनी पड़ी?

क्या डेवीज़ ने मादी शर्मा के ईमेल को सार्वजनिक कर भारत के पक्ष को कमजोर नहीं कर दिया?

क्या यह सब करने से कश्मीर के मसले का अंतर्राष्ट्रीयकरण नहीं होता है ?

 

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