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कुबेर ही बनतें हैं अखाड़ों मे महामंडलेष्वर

एक आम आदमी के मन मे साधु संतों की अलग ही छवि होती है। उसे लगता है कि दुनिया की मोहमाया से दूर, ईष्वर मे चैबीसों घंटे ध्यान लगाने वाला कठिन तपस्वी ही साधू हो सकता है और महामण्डलेष्वर तो और भी ऊंचा स्थान है। लेकिन वह आम आदमी षायद साधू सन्यासियों की असली जिंदगी से रत्ती भर वाकिफ नही है। वह इसकी कल्पना ही नही कर सकता है। क्योंकि सच्चाई यह है कि सनातन धर्म के रक्षक माने जाने वाले अखाड़ों के ये महामण्डलेष्वर आम आदमी से भी ज्यादा माया के भक्त होतें हैं। इसीलिये अखाड़ों मे महामण्डलेष्वर बनने के लिये भी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। सूत्रों के अनुसार, अखाड़ों मे महामण्डलेष्वर बनने के लिये सन्यासी होना, वेदष्षास्त्रों का जानकार होना ही काफी नही है। इसके लिये अच्छी-खासी धनराषि भी खर्च करनी पड़ती है। सन्यासी सम्प्रदाय से जुड़े अखाड़ों मे तो महामण्डलेष्वर बनने के लिये एक करोड़ रुपये तक खर्च करना पड़ता है। वैष्णव सम्प्रदाय के अखाड़ों मे यह रकम आधी हो जाती है। यह रकम की संख्या अखाड़ों के आकार पर निर्भर करती है। जितना बड़ा अखाड़ा महामण्डलेष्वर बनने के लिये उतनी बड़ी रकम की जरुरत होती है। विवादास्पद महामण्डलेष्वर सचिन दत्ता भी मुफ्त मे महामण्डलेष्वर नही बन गयें हैं। यहां तक पहुंचने के लिये उसने भी दो करोड़ की फीस भरी है।

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