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जनकवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’

 

ramashankar yadav vidrohiविगत तीन दशकों से जेएनयू कैंपस में रह रहे कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ ने 8 दिसंबर को एक छात्र-आंदोलन में इस दुनिया को अलविदा कह दिया. जेएनयू के पूर्व-छात्र, कवि और संस्कृतिकर्मी रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ का जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में एक किसान परिवार में 3 दिसंबर 1957 को हुआ था। बचपन से ही क्रांतिकारी मिजाज के रमाशंकर ने 1980 में जेएनयू के भारतीय भाषा में एम.ए. में दाखिला लिया। अध्यापकों के असहयोगात्क रवैया और अपनी फक्कड़पन प्रवृत्ति के कारण वे पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। संस्थागत जेएनयू ने उन्हें तिरस्‍कृत किया तो जेएनयू कैंपस ने उन्हें अपनाया। जेएनयू परिसर में वे लगभग 30 वर्षों से रह रहे थे। 8 दिसंबर की सुबह देशव्यापी छात्र-आंदोलन ‘आक्युपाई यूजीसी’ में ‘ब्रेन डेथ’ (दिमाग का अचानक काम करना बंद कर देना) के कारण उनका निधन हो गया। उन्होंने तीन दशकों तक छात्रों के कवि और संस्कृतिकर्मी की भूमिका अदा की। जेएनयू छात्र आंदोलन के सभी कार्यक्रमों में वे उपस्थित रहते और अपनी कविताओं का पाठ करते। कविता सुनाने के एक अलहदा अंदाज के कारण वे काफी लोकप्रिय रहे।

‘‘जब कवि गाता है, तब भी कविता होती है, और जब कवि रोता है, तब भी कविता होती है। कर्म है कविता, जिसे मैं करता हूं, फिर भी लोग मुझसे पूछते हैं कि विद्रोही तुम क्या करते हो…।’’ और पहले दिन तो हम भी पूछ बैठे थे कि ‘क्या करते हैं ये जनाब।’ ‘विद्रोही’ जी कवि हैं, जेएनयू के कवि। छात्र आंदोलन में भाग लेने के साथ ही मैंने यह जाना कि कवि विद्रोही जेएनयू कैंपस और छात्र आंदोलन के अभिन्न अंग हैं। विभिन्न प्रदर्षनों के दौरान जब हमारे प्रतिनिधि छात्रों के सवालों को सत्ता प्रतिश्ठानों के अंदर रख रहे होते तो बाहर कवि विद्रोही की कविता गूंजती थी-‘‘मेरा सर फोड़ दो/मेरी कमर तोड़ दो/पर ये न कहो कि अपना हक छोड़ दो।’’ फिर छात्रों की पसंदीदा ‘धरम’ कविता-‘‘धर्म आखिर धर्म होता है/जो सूअरों को भगवान बना देता है, चढ़ा देता है नागों के फन पर गायों का थन, धर्म की आज्ञा है कि लोगा दबा के रखें नाक/ और महसूस करें कि भगवान गंदे में भी गमकता है। जिसने भी किया है संदेह/ लग जाता है उसके पीछे जयंत वाला बाण/और एक समझौते के तहत/हर अदालत बंद कर लेती है दरवाजा।/अदालतों के फैसले आदमी नहीं। पुरानी पोथियां करती हैं…।’’

विद्रोही केवल हक ही नहीं मांगता, वह पूरी भारतीय व्यवस्था की भी पड़ताल करता है। उसकी कविताएं छात्रों के अंदर प्रगतिषील राजनीतिक चेतना का प्रसार करती हंै।
वे मध्यकालीन संतों की तरह ही वाचिक परंपरा के कवि थे। वे कविता लिखते नहीं थे, बल्कि कविता कहते थे। उनको लेकर यह किंवदंति भी थी कि वे कलम-कागज नहीं उठाते। उन्हें सैकड़ों कविताएं कंठश्थ थीं। और मेरे जैसे हजारों छात्रों को भी विद्रोही की अनेक कविताएं आज भी याद हैं। छात्रों की सभाओं में कविता सुनाने से पहले विद्रोही यह कहना नहीं भूलते कि ‘मैं देष के सबसे बुद्विजीवि छात्रों को अपनी कविता सुना रहा हूं।’ उनके इस उद्बोधन के साथ ही उनके प्रति स्रोताओं का ‘एटेंषन’ बढ़ जाता था। फिर बीच से फरमाइस होती-‘विद्रोही जी ‘मोहनजोदड़ों’ वाली सुनाइए।’ ‘‘कि आखिर क्या बात है कि/ प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर/ एक औरत की जली हुई लाष मिलती है/और इंसानों की बिखरी हुई हड्डिया मिलती है/जिसका सिलसिला/सीथिया की चट्टानों से लेकर बंगाल के मैदानों तक/और सवाना के जंगलों से लेकर कान्हा के वनों तक चला जाता है।’’ लेकिन कवि ‘विद्रोही’ की प्रतिज्ञा इस विचार पर ही समाप्त नहीं होती। वह कहता है-‘‘लेकिन मैं/स्पार्टकस का वंषज/स्पार्टकस की प्रतिज्ञाओं के साथ जीता हूं/कि जाओ कह दो सीनेट से/कि हम सारी दुनिया के गुलामों को इकट्ठा करेंगे/ और एक दिन रोम आएंगे जरुर।’’ इन साधारण से दिखने वाले कवि की असाधारण कविताओं के लिए जेएनयू में ही जगह थी। जिन वैचारिक विथिकाओं से जेएनयू के छात्र गुजरते हैं, उसके बिना विद्रोही की कविताओं का मूल्यांकन संभव नहीं था। विद्रोही की कविताओं को समझने के लिए भारतीय समाज-संस्कृति-इतिहास के साथ-साथ विष्व भूगोल और इतिहास की समझ जरुरी है। जेएनयू कैंपस उनका मंच था, जेएनयू के छात्र उनके ‘आडिएंस’ और उनकी आत्मा जेएनयू के खोहो-कंदराओं में बसती थी।
विद्रोही कम्युनिस्ट थे। लाल झंडा के प्रति उनके मन में आस्था थी। विद्रोही ने लिखा है कि-‘‘लाल झंडा हर इमारत पर गाड़ा जाएगा/आपके इस धर्म कांटे को उखाड़ा जाएगा।’ विद्रोही को अन्य द्विज कम्युनिस्टों की तरह धर्म और विचारधारा को साधते नहीं देखा गया। वह नास्तिकता है और उसकी हद को छू लेता है। कवि संस्करों से किसान है। किसान को परंपरावादी, धर्मभीरू कहने वाले विचारकों के प्रति यह कविता-‘‘मैं किसान हूं/आसमान में धान बो रहा हूं।/ कुछ लोग कह रहे हैं/पगले आसमान में धान नहीं जमता/मैं कहता हूं कि/गेगले-घोघले/अगर जमीन पर भगवान जम सकता है/तो आसमान में धान भी जम सकता है।/ और अब तो/दोनों में एक होकर रहेगा-या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा/या आसमान में धान जमेगा।’’ कबीर की तरह ही विद्रोही भी ‘अनभै-साॅचा’ का कवि है। एक भोला-भाला प्रष्न, जिसका उत्तर हमारे कथित धर्म के ठेकेदारों के पास नहीं हैं-‘क्या भगवान भी जमीन पर जम सकता है?’ कवि विद्रोही इन मानवीय प्रष्नों के निरीह उत्तरावली की प्रतिक्षा नहीं करता। ‘विद्रोही’ कहता है-‘‘उनसे कहने कि गर्दन झुकाओ चलो/अब गुनाहों को अपने कबूलो चलो/दोस्तों उस घड़ी के लिए अब चलो/और अभी से चलो उस खुषी के लिए/जिसके खातिर लड़ाई ये छेड़ी गई/जो षुरु से अभी तक चली आ रही/और चली जायेगी अंत से अंत तक/हम गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ेंगे।’’ वह मुक्ति की इस लड़ाई को बीच रास्ते में ही नहीं छोड़ना चाहता। उसे गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ना है।
विद्रोही की कविता विचार और क्रांति की कविता है। वह भावानुभूति का कवि नहीं है। कवि के भावना को विचार और आस्तिकता को नास्तिकता के द्वारा पछाड़ खाना पड़ता है। इस संदर्भ में अगर देखा जाए तो विद्रोही कबीर की परंपरा में उनसे आगे का कवि दिखाई देता है। जातीय और लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ उसकी कविताएं तलवार की तरह खड़ी हैं। विद्रोही ने क्रांति में आस्था जाहिर की। विद्रोही कहता है-‘‘जुल्म न होता, जलन न होती/जोत न जगती, क्रांति न होती/ बिना क्रांति के खुले न खजाना/ कहीं कभी भी षांति न होती।’’ बिना क्रांति के षांति भी नहीं होती। उनकी कविताओं में एक समतामूलक समाज का स्वप्न निहित है। ‘मोहनजोदड़ों की आखिरी सीढी से’, ‘गुलाम’, ‘औरतें’, ‘नूर मियां’, ‘धोबन का पता’, ‘कन्हई कहार’, ‘भुखाली हलवाह’, ‘मैं अहीर हूं’ आदि कविताएं जातिगत और लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ खड़ी हैं।
विद्रोही की कविताओं में दैन्यता नहीं दिखाई देती। वह पराजित हो गया है लेकिन वह योद्धा है। विद्रोही अपने प्रति योद्धओं जैसा सम्मान चाहता है। उनका व्यक्तिगत जीवन भी कुछ इसी प्रकार का रहा। विद्रोही ने अपनी षर्तों पर जीवन जीया। देखने में मैला-कुचैला, गरीब, भूखा-नंगा फटेहाल व्यक्ति। उनका दैनिक जीवन मुख्यतः छात्रों और कुछ अध्यापकों की सहयोग से चलता था। विद्रोही कहते थे कि वे छात्र आंदोलन से निकले हैं और छात्र आंदोलन में ही अपनी आहूती चाहते हैं। जेएनयू के कई पीढि़यों के छात्रों के साथ कंधों से कंधा मिलाकर चलने वाले इस कवि की कविताओं में कभी व्यक्तिगत दुख नहीं आ पाया है। कबीर की कविता में भी तुलसीदास की तरह दैन्यता, ‘अललात-बिललात’ या ‘मांग के खइबो, मसीत को सोइबो’, नहीं है और न ही विद्रोही की कविता में। यह पिछड़ी जातियों के साहित्य का सांैदर्यषास्त्र है। पिछड़ी जातियों के साहित्य, जो मुख्यतः विभिन्न भाशाओं के ‘लोक साहित्य’ के रुप में हैं, उनमें भी खुषी का ही रंग मिलेगा।
विद्रोही विराट विम्बों का कवि है। वह बड़े-बड़े उपमानों और रूपकों के साथ अपनी अपनी कविता को बुनता है। विद्रोही का सर ‘ये सर नहीं गुंबद है कोई, पीसा की मीनार है।’ ‘नानी’ कविता में-‘और मेरी नानी की देह, देह नहीं आर्मिनिया की गांठ थी/पामीर की पठार की तरह समतल पीठ वाली मेरी नानी, जब कोई चीज उठाने के लिए झुकती थी, तो लगता था/जैसे बाल्कन झील में काकेसस की पहाड़ी झुक गई हो!…मैं देखता हूं कि मेरी नानी हिमालय पर मूंग दल रही है/और अपनी गाय को एवरेस्ट के खूंटे से बांधे हुए है।’ जब विद्रोही अपनी दादी की अंतिम राख को नदी में फेंक रहा है तो उसे ऐसा प्रतीत हो रहा है-‘‘मुझे लगा ये नदी, नदी नहीं/ मेरी दादी की आंखें हैं/और ये राख, राख नहीं/नूर मियां का सुरमा है/जो मेरी दादी की आंखों में पड़ रहा है।’ विद्रोही कहात है-‘मैं अहीर का बच्चा हूं दोस्तों! एक बूंद दूध में/सातों समंदर उड़ेल दूंगा…। ‘जन-गण-मन’ में कवि कहता है-मैं एक पराजित योद्धा हूं/ और पड़ गया हूं मौत का विस्तर बिछाकर/ जलते हुए समंदर की बड़वाग्नि में…।’ भक्तिकाल में कबीर की कविताओं में भी इसी प्रकार विराट बिम्ब पाये जाते हैं। ‘‘चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।’’ कबीर की इस कविता में पृथ्वी और आसमान को एक चक्की से तुलना की गई है। श्रमषील जातियों से आने के कारण ही इन कवियों की कविताओं में इस प्रकार के बिम्बों की परिकल्पना संभव हो पाई है। ये बिम्ब इनके संघर्शषील प्रवृत्तियों के परिचायक हैं।
अन्याय के खिलाफ न्याय की लड़ाई कोई नई नहीं है। यह अनार्य कवि उन सभी आदिम स्थितियों को भी बार-बार याद करता है। ‘वह एक योद्धा है और पराजित हो गया है।’ उसकी कविता में आदिम सभ्यताओं के संघर्श का उल्लेख है। मोहनजोदड़ों उसकी कविता में बार-बार आता है। ‘‘मैं वहां से बोल रहा हूं/जहां मोहनजोदड़ों के तलाब की आखिरी सीढ़ी है/जिस पर एक औरत की जली हुई लाष पड़ी है/और तलाब में इंसानों की हड्डियां बिखरी पड़ी हैं।’’ ‘पुरखे’ कविता में कवि कहता है-‘‘नदी किनारे, सागर तीरे/पर्वत-पर्वत, घाटी-घाटी/बना बावला सूंघ रहा हूं/मैं अपने अपने पुरखों की माटी। सिंधु, जहां सैंधव टापों के/गहरे बहुत निषान बने थे/हाय खुरों से कौन कटा था/बाबा मेरे किसान बने थे।’ कवि ‘विद्रोही’ के लिए क्रांति और मुक्ति का तात्पर्य तात्कालिक स्थितियां मात्र नहीं हैं, वह इतिहास के एक-एक पन्नों को खोलता है।
विद्रोही पिछड़ी जातियों का जातीय कवि है। कबीर की ही भांति विद्रोही की कविता में भी जातीय स्वाभिमान बार-बार झलकता है। वह अपनी कविताओं में किसानों, चरवाहों-चरवाहिनों का जीक्र करना नहीं भूलता। ‘जिंदगी’ कविता में विद्रोही कहता है-‘‘मैं अहीर का बच्चा हूं दोस्तों! एक बूंद दूध में/सातों समंदर उड़ेल दूंगा/और तब पूछूंगा/तुम्हारे राजहंसों सेे/कि बताओ/भैंस के खून में कितना दूध होता है और कितना पानी!’’ विद्रोही अपनी एक कविता में इस दुनिया को अपनी भैंस की उपमा देता है-‘‘मैं अहीर हूं/और ये दुनिया मेरी भैंस है।/मैं उसे दूह रहा हूं/और कुछ लोग उसे कुदा रहे हैं/ये कौन लोग हैं जो कुदा रहे हैं/आपको पता है?/क्यों कुदा रहे हैं/…हां, इतना तो पता है/कि नुकसान तो हर हालत में/हमारा ही होगा/क्योंकि भैंस हमारी है/और दुनिया भी हमारी है।’’ विद्रोही एक चरवाहा है और यह दुनिया उसकी भैंस। वह इस दुनिया से उसी प्रकार प्रेम करता है जिस प्रकार वह अपनी पषुओं से करता है। इस दुनिया का कुछ भी नुकासान होता है तो वह उसका निजी नुकसान है क्योंकि भैंस उसकी है और दुनिया भी उसकी है। यहां जीवन और कविता का एकात्म हो गया है।
विद्रोही केवल हिन्दी का ही कवि नहीं है। वह हिन्दी से बड़ा अवधी का कवि है। उन्होंने अपने पारंपरिक जातीय गीत ‘चनैनी’ (जिसे ‘अहिरऊ’ भी कहा जाता है) की भी रचना की है। उनका काव्य संग्रह ‘नई खेती’ में संग्रहित अवधी का एक बिरहा गीत-‘‘मोरे ऊसरे के खेतिया कंकरिया जमी/जैसी पुरखा-पुरनिया के सोरिया जमी/…केउ न पूछतई कि कइसे कंकरिया जमी/इ अंगरेजिया जीम ई जमींदरिया जमी/ई काष्तकरिया जमी इ भूमिधरिया जमी/इ सिकमी जमी और अधिकरिया जमी/गांधी-नेहरू के बाप के जगीरिया जमी…।’’ विद्रोही अपने को अवध प्रदेष के सूफी संत-कवियों से जोड़ते थे।
कबीर की तरह विद्रोही भी अपनी कविताओं के माध्यम से संबोधित करता हैं। कवि के सामने कोई ‘साधो’ नहीं है, उसके सामने स्त्री, दलित और किसान, मजदूरों की पिछड़ी जातियां हैं। वंचितों के कवि ‘विद्रोही’ मानवता के दुष्मनों को खुली चुनौती देता है-‘‘हमारे खुरदुरे पांव की ठोकर से/धंसक सकती है तुम्हारी ये जमीन/हमारे खर्राये हुए हाथों की रगड़ से/लहूलुहान हो सकता है तुम्हारा कोमल आसमान/हम अपने खून चूते नाखूनों से/चीर देंगे तुम्हारे मखमली गलीचों को/और जब हम एक दिन/जमीन से आसमान तक/खड़े-खडे़ फाड़ देंगे तुम्हारी मेहराबें/ तो न उसमें से कोई/कच्छप निकलेगा न ही कोई नरसिंह। तुम सूअरों से लेकर सिंहों तक/सारे जानवरों के स्वभाव अपना लो/मगर, हम तो गुरिल्लों की औलाद हैं, और गुरिल्ले ही रहेंगे।’ ‘हम-तुम’ षैली की इस कविता का संदेष बहुत ही स्पश्ट है। इस कविता के माध्यम से कवि भारत की आर्थिक गुलामी के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रतीकों को भी रेखांकित करता है। इन सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से वह हिन्दू धर्म की गैर-बराबरी आधारित वैचारिकी पर सवाल खड़ा करता है।
विद्रोही जेएनयू में लगभग तीन दषकों से रह रहे थे परंतु कैंपस में पिछड़े वर्ग के छात्रों की संख्या के साथ ही उनकी स्वीकार्यता भी बढती गई। जेएनयू कैंपस का पिछड़ा वर्ग आंदोलन ने उनकी कविता को एक नई संजीवनी दी। यह अनायास ही नहीं हैं कि 2010 में आॅल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के गठन के बाद ही विद्रोही की बहुप्रतिक्षित काव्य संग्रह ‘नई खेती’ (2011) का प्रकाषन हुआ। उन पर डाॅक्युमेंट्री और फिल्में (मैं तुम्हा कवि हूं, 2011) उसी समय बनी। समान सामाजिक पृश्ठभूमि से आए छात्रों के साथ विद्रोही ने गहरा सामंजस्य बैठाया। पिछड़े वर्ग के छात्रों में उनकी काफी ‘पाॅपुलरिटी’ थी। वे बैकवर्ड फोरम द्वारा आयोजित लगभग सभी कार्यक्रमों में अपनी कविता पढ़ते। विद्रोही जेएनयू के छात्रों के बीच काफी मषहूर थे, इसका अंदाजा उनके अंतिम समय श्रद्धांजलि देने उमड़ी छात्रों की भीड़ से पता चलता है। उनके निधन पर देष के लगभग सभी प्रमुख अखबरों ने उनको श्रद्धांजलि दी। जेएनयू समेत कई विष्वविद्यालयों में षोक मनाया गया। कई गायकों ने उनकी कविताओं को गाकर उन्हें ‘नमन’ किया। विद्रोही के जीवन और संघर्श पर नितिन पमनानी द्वारा बनाई गई वृतचित्र ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ काफी प्रसिद्ध रही। इसे मुंबई अंतर्राश्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अंतर्राश्ट्रीय स्पद्र्धा श्रेणी में सर्वश्रेश्ठ वृतचित्र का ‘गोल्डल कौंच’ पुरस्कार प्राप्त हुआ है। ।
विद्रोही मजदूरों, किसानों, महिलाओं, दलितों, वंचित पिछड़ी जातियों से कह रहा है कि तुम मुझे बचाओं, मैं तुम्हारा कवि हूं-‘‘मैं कहता हूं तुम मुझे इस आग से बचाओ मेरे लोगों!/…मुझकों बचाना अपने पुरखों को बचाना है/मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है/तुम मुझे बचाओ!/मैं तुम्हारा कवि हूं।’’ विद्रोही मरा नहीं है जिंदा है। वह कहता है-‘‘मरने को चे ग्वेरा भी मर गए/और चंद्रषेखर भी/लेकिन वास्तक में कोई नहीं मरा है। सब जिंदा हैं/जब मैं जिंदा हूं/ इस अकाल में।/मुझे क्या कम मारा गया है/ इस कलिकाल में/अनेको बार मुझे मारा गया है/ अनेकों बार घोशित किया गया है/राश्ट्रीय अखबारों में, पत्रिकाओं में/कथाओं में कहानियों में/कि विद्रोही मर गया।/तो क्या मैं सचमुच मर गया!/नहीं मैं जिंदा हूं/और गा रहा हूं।’’ विद्रोही मरा नहीं है। वह सचमुच जिंदा है और गा रहा है। मेरे जैसे लाखों लोग उसे सुन रहे हैं और बढते जा रहे हैं। वह क्रांति का गीत गा रहा है।

जितेंद्र यादव
संपर्कः 9968124622

फेसबुक  पर सिद्धार्थ विमल जी की वाल से साभार

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