सिख फर्जी मुठभेड़- 47 पुलिसकर्मियों को सजा सुनाएगी अदालत

policeलखनऊ,  उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में 25 वर्ष पहले दस सिख श्रद्धालुओं को आतंकवादी बताकर मार देने के आरोप में केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत कल 47 पुलिसकर्मियों को सजा सुनाएगी।  अदालत ने इन पुलिसकमिर्यों को गत एक अप्रैल को दोषी करार दिया था। अदालत ने इन पुलिसकर्मियों को चार अप्रैल को सजा सुनाने का एलान किया था। सीबीआई की विशेष अदालत के न्यायाधीश लल्लू सिंह ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुनाया था। उस समय पीलीभीत के पुलिस अधीक्षक आर डी त्रिपाठी थे। पुलिस अधीक्षक आर डी त्रिपाठी सहित हत्या काण्ड मे लिप्त पुलिसकमिर्यों को तत्कालीन यूपी की भाजपा सरकार ने पुरस्कृत भी किया था।

पीलीभीत में 25 वर्ष पहले तीर्थयात्रियों से भरी बस से 10 सिख तीर्थ यात्रियों को उतारकर उन्हें आतंकवादी बताते हुए फर्जी मुठभेड में मार दिया गया था। अदालत ने आरोपियों को दोष सिद्ध करार देते हुए उपस्थित 20 आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में लेकर तत्काल जेल भेज दिया था । शेष 27 दोषियों के विरूद्ध वारण्ट जारी करते हुए उन्हें चार अप्रैल को हाजिर होने का आदेश दिया था। मामले में कुल 57 आरोपी थे। मुकदमे के दौरान दस की मृत्यु हो गई थी। इनमें न्यूरिया का तत्कालीन थानाध्यक्ष क्षत्रपाल सिंह, उपनिरीक्षक ब्रम्हपाल, कांस्टेबल अशोक पाल सिंह, मुनीस खां, कृष्ण बहादुर, रामस्वरूप, सूरज पाल सिंह, अशोक कुमार उपनिरीक्षक राजेश चन्द्र शर्मा और एम पी सिंह शामिल थे।

अदालत ने अपने 181 पृष्ठ के निर्णय में दिये अपने तल्ख टिप्पणी में कहा था कि इसमें किसी बात का संदेह नहीं है कि थाना बिलसण्डा के फगुनाई घाट में मारे गए चार सिखों के शवों का पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम के बाद लावारिस दिखाते हुए उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। इसी तरह थाना न्यूरिया के घमेला कुआं में चार सिख तथा थाना पूरनपुर के पत्ताबोझी में दो सिखों के शव का पोस्टमार्टम कर आनन फानन में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि इस प्रकार दस सिख युवकों को पीलीभीत पुलिस द्वारा मारे जाने में कोई संदेह नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि इस तथ्य पर भी कोई संदेह नहीं है कि घटना 12 जुलाई 1991 की रात में पीलीभीत के थाना बिलसण्डा के फगुनाई घाट में व थाना पूरनपुर के पत्ताबोझी जंगल में घटित हुई। अभियोजन के अनुसार 12 जुलाई. 1991 को दस सिख युवकों को पुलिसकर्मियों द्वारा बस से उतारकर एक नीली बस में बैठाकर नदी के किनारे ले जाया गया। इन दस युवकों को पुलिस ने तीन भागों में बांट दिया और जंगल में ले जाकर फर्जी मुठभेड दिखाते हुए उनकी हत्या कर दी। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि उस समय आतंकवाद चरम पर था और कुछ यात्रियों की पृष्ठभूमि भी आतंकवाद से सम्बन्धित थी तथा उनको फर्जी मुठभेड में मारकर अपनी प्रोन्नति का मार्ग प्रशस्त करने के लालच में पुलिस ने ऐसा कार्य किया। अदालत ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों व अन्य साक्ष्यों के अवलोकन व विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि आरोपित पुलिसकर्मियों ने दसों सिख युवकों को अन्तिम बार अपने कब्जे में लिया और चौबीस घण्टे के बाद उनके शव पाए गए। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि जिस समय पुलिस बल द्वारा सिख युवकों को यात्री बस से उतारा गया उस समय उनके पास कोई आग्नेयास्त्र बरामद नहीं हुआ था। जब पुलिस ने इनको पकड लिया तो भारत की स्थापित विधिप्रक्रिया का पालन किया जाना था, परन्तु प्रोन्नति और प्रशस्तिपत्र हासिल करने के लालच में आकर पुलिसकर्मियों ने फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उनकी हत्या कर दी। यदि, वास्तव में वे दस सिख युवक आतंकवादी होते तो पुलिस पकडकर कानून का पालन करते हुए कार्सवाई करती। लेकिन, पुलिस ने ऐसा न करके आपराधिक षडयन्त्र के तहत दसों सिख युवकों की हत्या कर दी और इस हत्या को मुठभेड दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किये। गौरतलब है कि 12 जुलाई, 1991 को नानकमथा, पटनासाहिब, हुजुरसाहिब एवं अन्य तीर्थस्थलों की यात्रा करते हुये 25 तीर्थयात्रियों का जत्था बस से वापस लौट रहा था तभी कछाला घाट के पास आरोपित पुलिसकर्मियों ने सिख युवकों को उतार लिया और अलग अलग तीन थाना क्षेत्रों में मुठभेड दिखाकर उनकी हत्या कर दी। पुलिस ने इन मृत सिखों के विरूद्ध जानलेवा हमला करने की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर इस मामले में जांच सीबीआई से कराई गई।

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