‘भारतीय साहित्य में नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

नयी दिल्ली,  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व, विचार और भारतीय साहित्य में उनकी बहुआयामी उपस्थिति पर केंद्रित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन द पेन फाउंडेशन, हंसराज कॉलेज तथा माटी न्यास के संयुक्त संयोजन में किया गया। दिल्ली सरकार की हिंदी व उर्दू अकादमी के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर के शिक्षाविदों, लेखकों, पत्रकारों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि विजय गोयल ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अदम्य साहस, पराक्रम और त्याग की प्रतिमूर्ति बताते हुए कहा कि उनका जीवन और विचार आने वाली पीढ़ियों को सदैव राष्ट्रसेवा और कर्तव्यपथ पर चलने की प्रेरणा देते रहेंगे। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं गांधी दर्शन के उपाध्यक्ष श्री गोयल ने कहा कि नेताजी केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और आत्मबल के प्रतीक थे।

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय मयूख ने नेताजी के जीवन को युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताते हुए कहा कि आज के युवाओं को उनके आदर्शों से सीख लेकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि नेताजी का संघर्ष और त्याग हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है।

एसएनएसएमटी अध्यक्ष सुपर्णो सतपथी ने कहा कि नेताजी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक साहसी स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी नेता और सच्चे देशभक्त थे। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी का योगदान ऐतिहासिक है, किंतु नेताजी का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण और व्यापक है, जिसे सही संदर्भों में समझने की आवश्यकता है।

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नीतीश्वर कुमार ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस साहित्यकारों और कलाकारों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहे हैं। हिंदी, बंगला, उर्दू सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में उन्हें केंद्र में रखकर कवितायें, कहानियां, नाटक और अन्य साहित्यिक कृतियां लिखी गई हैं, जो उनके विचारों को जनमानस तक पहुंचाती हैं। स्वागत एवं विषय प्रवेश द पेन फाउंडेशन के अध्यक्ष आसिफ़ आज़मी ने प्रस्तुत किया।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने की। उन्होंने कहा कि नेताजी का जीवन दर्शन ‘लेने से अधिक देने’ का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में प्रधानमंत्री की विशेष पहल से नेताजी को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से स्मरण किया जा रहा है और उनकी जयंती को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया जाना इसी का प्रमाण है।

ब्रिगेडियर दीपेंद्र रावत ने कहा कि महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों के बीच कोई खाई नहीं है। दोनों का लक्ष्य एक ही था—भारत की स्वतंत्रता। नेताजी एक यथार्थवादी नेता थे, जिन्होंने परिस्थितियों के अनुसार अपने संघर्ष के रास्ते चुने। इस अवसर पर लेखक दीपक कुमार उपस्थित रहे।

सेमिनार के संयोजक आसिफ़ आज़मी ने बताया कि इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर हिंदी, बंगला, उड़िया, मराठी और उर्दू में लिखी गई साहित्यिक सामग्रियों का मूल्यांकन कर उनका संकलन करना है, ताकि शोधार्थियों और पाठकों को एक समग्र दृष्टिकोण उपलब्ध कराया जा सके।

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