लखनऊ , जाने-माने लेखक व पत्रकार संजय कुमार की हाल में प्रकाशित किताब मीडिया , महिला, जाति और जुगाड़ पर परिसंवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया।
जन संस्कृति मंच लखनऊ की ओर से हुए इस कार्यक्रम में संजय कुमार ने अपने अनुभवों के साथ ही कृति से जुड़े अहम पहलू पर अपनी बात रखी। उन्होने इस दौरान उठे सवालों के जवाब भी दिए।
संजय कुमार ने बताया कि मीडिया जगत में इतने लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने मीडिया को काफी नजदीक से देखा है। मीडिया की जो तस्वीर है, उसे इस किताब के माध्यम से आइना दिखाने की कोशिश की गई है। ताकतवर होती मीडिया पर जातिवादी होने, महिला प्रेमी होने और जुगाड़ संस्कृति को हवा देने का आरोप हाल के कई घटनाओं ने प्रमाणित किया है।
न सिर्फ सरकारी, बल्कि निजी मीडिया दोनों में महिलाओं को लेकर कई ऐसे तथ्य सामने आएं हैं, जो चौंकाने वाले हैं और मीडिया की हकीकत उजागर करते हैं। महिलाओं के लिए मीडिया में राह बनाना और उसपर आगे बढ़ते रहना अधिक मुश्किलों भरा होता है।
भारतीय मीडिया कितना जातिवादी है, इसका खुलासा मीडिया के राष्ट्रीय सर्वे से साफ हो चुका है। 90 प्रतिशत से भी ज्यादा द्विजों के मीडिया पर काबिज होने के सर्वे ने सच सामने ला दिया । भारतीय मीडिया में दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यकों की भागीदारी नहीं के बराबर होने के पीछे उन्हें एक साजिश के तहत मीडिया में घुसने नहीं देने की मानसिकता है।
निजी मीडिया की तरह ही सरकारी मीडिया में भी इनकी भागीदारी नहीं के बराबर दिखती है। मात्र आरक्षण के कारण, यहां दस से बीस प्रतिशत दलित-पिछड़े दिख जाते हैं। भारतीय मीडिया पर घोर जातिवादी होने के आरोपों को सर्वे ने प्रमाणित किया है। संपादक व मालिक अपने संस्थान में अपनी ही जाति के लोगों को मौका देते हैं। यही वजह है कि दलित-पिछड़े अवसर पाने से वंचित हो जाते हैं।
भारतीय जीवन में जुगाड़ एक ऐसा शब्द है जिससे हर कोई वाकिफ है। इस शब्द से मीडिया भी अछूता नहीं है। इसका प्रभाव यहां भी देखा जाता है। जुगाड़ का मतलब है, जान-पहचान या संबंध जोड़ कर मीडिया में घुसपैठ। जुगाड़ होने पर अयोग्यता कोई अर्थ नही रखती है।