यूपीपीसीबी-महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय की संगोष्ठी में पर्यावरणीय चुनौतियों पर मंथन

गोरखपुर, रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित और ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा है कि विकास का सनातन मॉडल ही भारत को पुनः विश्वगुरु बना सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय चिंतन में विकास और प्रकृति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
डॉ. सिंह मंगलवार को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) एवं महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘विकास के साथ पर्यावरणीय चुनौतियां : साझा प्रयास से सतत विकास’ विषयक संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने प्रदेश सरकार और यूपीपीसीबी को इस विषय पर सार्थक पहल के लिए बधाई देते हुए कहा कि विकास की दिशा में आगे बढ़ते समय पर्यावरणीय संतुलन को केंद्र में रखना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि भारत को पुनः विश्वगुरु बनना है तो अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा और प्रकृति-सम्मत विकास मॉडल को अपनाना होगा।
जल संकट को वैश्विक चुनौती बताते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि इसका समाधान स्थानीय स्तर पर सामुदायिक भागीदारी से संभव है। उन्होंने जल साक्षरता बढ़ाने और वाटर डिस्चार्ज व वाटर रिचार्ज के बीच संतुलन स्थापित करने पर जोर दिया। संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज कुमार सिंह ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक संस्था का कार्य नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि संविधान में 1976 के संशोधन के बाद पर्यावरण शब्द जोड़ा गया। विकसित देशों के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि स्वच्छता और पर्यावरणीय अनुशासन के साथ तीव्र विकास संभव है।
अपर मुख्य सचिव वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन अनिल कुमार ने बताया कि राज्य में 95 प्रतिशत डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण का ट्रीटमेंट किया जा रहा है। लिगेसी वेस्ट और लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं।





