हिंदी के वरिष्ठ समालोचक वीरेंद्र यादव का निधन

लखनऊ, प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे हिंदी के वरिष्ठ समालोचक और आलोचना-लेखन में सक्रिय वीरेंद्र यादव का शुक्रवार सुबह हृदय गति रुकने से निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे।

वह लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके में निवास करते थे। परिजनों के अनुसार पिछले कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था। शुक्रवार को अचानक तबीयत बिगड़ने पर उनका निधन हो गया। पांच मार्च 1950 को जौनपुर जिले में जन्मे वीरेंद्र यादव ने उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उन्होंने राजनीतिशास्त्र में एमए किया था। छात्र जीवन से ही वह वामपंथी बौद्धिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे और आगे चलकर साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत में एक सशक्त हस्तक्षेपकारी आवाज के रूप में पहचाने गए।

वीरेंद्र यादव ने उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ में लंबे समय तक सचिव पद की जिम्मेदारी निभाई। साथ ही उन्होंने चर्चित साहित्यिक पत्रिका ‘प्रयोजन’ का संपादन भी किया। पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे। खासतौर पर प्रेमचंद पर केंद्रित बहसों और ‘1857’ के विमर्श पर उनके लेखन को व्यापक चर्चा मिली।

अनुवाद के क्षेत्र में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अमेरिकी लेखक जान हर्सी की चर्चित कृति ‘हिरोशिमा’ का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया। उनके कई लेखों के अनुवाद अंग्रेजी और उर्दू में भी प्रकाशित हुए। उनका चर्चित विनिबंध ‘राग दरबारी’ उपन्यास पर केंद्रित है, जिसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के एमए पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। वहीं ‘नवें दशक के औपन्यासिक परिदृश्य’ पर उनका लेख ‘पहल पुस्तिका’ में प्रकाशित हुआ था। साहित्यालोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2001 में ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ से सम्मानित किया गया था।

उनके निधन पर आलोचक नलिन रंजन सिंह, राकेश वेदा, दीपक कबीर सहित अनेक साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने उनके निधन को साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति बताया है।

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