बगैर मान्यता चल रहे संस्थानों के खिलाफ मामले में उच्च न्यायालय में जवाब तलब

लखनऊ, उत्तर प्रदेश में कथित रूप से बगैर मान्यता के चल रहे शिक्षण संस्थानों के खिलाफ सख्त कारवाई के आग्रह वाली जनहित याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने सख्त रुख अपनाया है।

कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी), बार काउंसिल ऑफ इंडिया(बी सी आई), (बीसीयूपी) समेत श्रीरामस्वरूप मेमोरियल यूनिवर्सिटी(एसआरएमयू), बाराबंकी को दो सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही कोर्ट ने एसआरएमयू को विधि कोर्स चलाने की मंजूरी के दस्तावेज वेबसाइट पर अपलोड करने का दिया निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ल की खंडपीठ ने बृहस्पतिवार को यह आदेश सौरभ सिंह की जनहित याचिका पर दिया। याचिका में हाल ही में बाराबंकी के श्रीराम स्वरुप कॉलेज में कानून की कथित फर्जी डिग्री प्रकरण का मुद्दा भी उठाया गया है। याची का कहना था कि कॉलेज के पास विधि शिक्षा देने की मंजूरी नहीं थी, इसके बावजूद छात्रों का एडमिशन लिया गया। यह न केवल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि कानून के भी खिलाफ है। याची ने सुनवाई के दौरान एसआरएमयू में बीते 1 सितंबर को हुए बवाल के बाद तीन सितंबर को विधि शिक्षा देने की मंजूरी मिलने का मुद्दा भी उठाया।

उधर, याचिका का विरोध करते हुए, राज्य के मुख्य स्थाई अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि राज्य सरकार खुद इस मामले की गहन जांच करवा रही है, ऐसे में याचिका खारिज करने योग्य है। जबकि, एसआरएमयू के अधिवक्ता अमित जायसवाल ने कोर्ट को बताया कि बीसीआई ने यूनिवर्सिटी को विधि कोर्स चलाने की मंजूरी 3 सितंबर को दे दी है। इसपर कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को इसके दस्तावेज वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया।

याचिका में आग्रह किया गया है कि मामले में राज्य सरकार को जांच समिति गठित करने का आदेश दिया जाए और ऐसे संस्थानों को बंद किया जाए जो बिना मान्यता व मंजूरी के छात्रों को प्रवेश देकर डिग्रियाँ बाँट रहे हैं। कहा कि यह मामला सामने आने के बाद छात्रों और अभिभावकों में चिंता बढ़ गई है। शिक्षा के नाम पर इस तरह की कथित अनियमितताओं को लेकर कड़ा कदम उठाने की मांग भी याची ने की है।

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