“मायावती: राजनीतिक चुनौतियां और संभावनाएँ”

मायावती और बहुजन समाज पार्टी के लिए साल 2026 अत्यंत महत्वपूर्ण है। मायावती, 2026 में, अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाने और बहुजन राजनीति को फिर से सत्ता तक पहुंचाने के लिए एक नए दौर के संघर्ष से गुजर रही हैं। वर्तमान में उनके सामने कई प्रमुख राजनैतिक चुनौतियां हैं लेकिन इसी के साथ संभावनाओं की नई रोशनी भी मौजूद हैं। सबसे पहले हम बात करतें हैं मायावती के सामने मौजूद वर्तमान राजनैतिक चुनौतियों की और उसके बाद हम बात करेंगे कि मौजूदा समय में मायावती के लिये क्या राजनैतिक संभावनायें हैं जो मायावती को पुन सत्ता मे वापसी करा सकता है।
बसपा के लगातार गिरते ग्राफ के कारण, मायावती के सामने बडी चुनौती अपनी राजनैतिक जमीन बचाने की है। कास्ट पालिटिक्स में बसपा पिछड चुकी है। जिसमें कभी वह नंबर वन रही है। बसपा के दलित वोट बैंक में सेंध लग चुकी है। मायावती के मुख्य जाटव वोट बैंक पर भी भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी लगातार निशाना साध रही हैं। इसके अतिरिक्त, चंद्रशेखर आजाद की ‘आजाद समाज पार्टी’ भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित युवाओं के बीच बसपा के विकल्प के रूप में उभर रही है।
मायावती के दलित वोट बैंक के साथ-साथ मुस्लिम वोट बैंक भी बिदक चुका है। 20% दलित और 19% मुस्लिम मतों ने मिलकर 2007 में यूपी मे मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। बसपा का दलित-मुस्लिम गठजोड़ टूटकर सपा के एम वाई समीकरण मे बदल गया है।अब मायावती की बडी जरूरत है कि फिर से दलित और मुस्लिम मतों को जोड़कर एक अजेय वोट बैंक बनाये।दलितों की तरह ओबीसी वर्ग की भी प्रमुख जातियां- मौर्य- कुशवाहा, कुरमी, पाल, यादव, निषाद आदि बसपा से छिटक कर सपा और बीजेपी की तरफ रूख कर चुकीं हैं। जिन्हे वापस लाना मायावती के लिये एक बडी चुनौती होगी।
मायावती ने 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का निर्णय लिया है। हालांकि यह उनकी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की रणनीति है। लेकिन गठबंधन राजनीति के इस दौर में मायावती की एकला चलो की नीति, बसपा पर भारी पडती नजर आ रही है। देश की वर्तमान द्विध्रुवीय राजनीति (NDA बनाम INDIA) में अकेले लड़ना उनके लिए बड़ी चुनौती है। अब देखना ये है कि बसपा की राजनीति को आगे बढाने के लिये मायावती दोनों गठबंधन मे किसको चुनती हैं या एकला चलो की नीति पर ही आगे बढती हैं।
मायावती के सामने मौजूदा समय में चुनौती संसद के अंदर भी है। और ये चुनौती है, बहुजन समाज पार्टी को संसद में शून्य की स्थिति से बाहर निकालने की है। 36 वर्षों में पहली बार संसद के दोनों सदनों में बसपा का प्रतिनिधित्व ‘शून्य’ हो सकता है। लोकसभा मे बसपा का कोई सांसद नही है, जबकि राज्यसभा में बसपा का मात्र एक सांसद है। एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी लाल गौतम का कार्यकाल भी नवंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में केवल एक विधायक होने के कारण बसपा के पास अपना नया सदस्य भेजने की संख्या नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप, संसद के दोनों सदनों में बसपा का प्रतिनिधित्व ‘शून्य’ हो सकता है।
पिछले चुनावों में लगातार खराब प्रदर्शन के बाद बसपा कार्यकर्ताओं में निराशा और जमीनी स्तर पर नेतृत्व की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। जिसके कारण बहुजन समाज पार्टी संगठनात्मक निष्क्रियता से ग्रस्त नजर आ रही है। कार्यकर्ताओं को एकबार फिर मिशनरी मोड पर लाने और उनमें 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उर्जा भरने की जरूरत है।
मायावती की उम्र भी एक बडी रूकावट बन रही है। इसबार मायावती ने अपना 70 वां जन्मदिन मनाया है। अब वह उम्र के एसे पडाव पर हैं जहां उनका राजनैतिक तजुर्बा तो अहमियत रखता है लेकिन इस उम्र मे राजनैतिक भागदौड और संपर्क मुश्किल है।
लेकिन इन सब चुनौतियों के बावजूद, मायावती जैसी जमीनी नेता के लिये संभावनाओं की कमी नही है। और इसी वजह से उन्होने राजनैतिक संभावनायें तलाशनें और भविष्य की रणनीति को जमीनी रूप देना शुरू कर दिया है।
वर्तमान साल 2026 को मायावती ने 2027 के लिए ‘ग्राउंडवर्क’ साल के रूप में चुना है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले 2026 में होने वाले पंचायत चुनाव बसपा के लिए अपनी ताकत दिखाने का सबसे बड़ा अवसर हैं। पार्टी इन चुनावों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में अपना जनाधार वापस पाने की कोशिश कर रही है। उनकी रणनीति पंचायत चुनावों के माध्यम से पार्टी की जमीनी पकड़ मजबूत करने की है। उन्होंने गांव-गांव में सदस्यता अभियान तेज करने और दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों को एकजुट करने के निर्देश दिये है। इसी लिये मायावती ने 2026 को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तैयारी के लिए निर्णायक वर्ष घोषित किया है।
मायावती 2007 के अपने सफल फॉर्मूले को नए सिरे से लागू कर रही हैं। वे दलित-मुस्लिम-ओबीसी गठजोड़ बनाने के लिए ‘भाईचारा कमेटियों’ को सक्रिय कर रही हैं। उनका गणित है कि 20% दलित और 19% मुस्लिम मिलकर एक मजबूत आधार बना सकते हैं। वहीं, ओबीसी वोट जुडकर उन्हे बडी आसानी से सत्ता तक पहुंचा सकता है। इसके लिये पार्टी अपने पुराने वैचारिक संगठन बामसेफ को फिर से संगठित कर रही है ताकि दलित और पिछड़े वर्ग के कर्मचारियों और बुद्धिजीवियों को पार्टी के मिशन से जोड़ा जा सके। निश्चित रूप से बामसेफ (BAMCEF) बसपा के पुनरुद्धार: के लिये बडा सहयोगी सिद्ध हो सकता है।
70 साल की हो चुकीं मायावती को ये समझ में आ गया है कि अब पार्टी को युवा नेतृत्व ही आगे ले जा सकता है। मायावती ने अपना 70वां जन्मदिन 15 जनवरी 2026 को ‘जन कल्याणकारी दिवस’ के रूप में मनाया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं ने इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किये।
बहन जी के 70वें जन्मदिन पर कार्यकर्ताओं ने सभी बूथ और भाईचारा कमेटियों के गठन को 15 जनवरी 2026 तक पूरा करने का प्रयास भी किया। 2026 में मायावती निष्क्रिय पदाधिकारियों को हटाकर संगठन को युवा नेतृत्व के जरिए नई ऊर्जा देने पर केंद्रित हैं। इसीलिये मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद को सक्रिय राजनीति में आगे बढ़ा रही हैं. ताकि पार्टी से युवाओं को जोड़ा जा सके।
2026 बसपा के लिए चुनौतीपूर्ण साल माना जा रहा है। इसीलिये 2026 मायावती के लिए “अस्तित्व बचाने और संगठन को पुनर्जीवित करने” का वर्ष है। यदि वे पंचायत चुनावों में सफल रहती हैं, तो 2027 के विधानसभा चुनावों में उनकी प्रासंगिकता पुनः स्थापित हो सकती है।





