साहित्यकार वीरेंद्र यादव “लाल सलाम कामरेड!”

लखनऊ, “16 जनवरी 2026… एक ऐसा दिन जब हिंदी साहित्य और जनपक्षधर पत्रकारिता का एक मजबूत स्तंभ हमसे हमेशा के लिए विदा हो गया। हृदयघात ने हमसे छीन लिया हमारे प्रिय वीरेंद्र यादव जी को…

मुझे याद आरहें हैं 18 अक्टूबर 2015 के वह क्षण जब लखनऊ के हजरतगंज स्थित अंबेदकर महासभा के प्रांगण में हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार और प्रगतिशील आलोचक वीरेंद्र यादव ने न्यूज़ 85 का लोकार्पण कर अपने आशीर्वचन के रूप मे निष्पक्ष, निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता के जरिये हाशिये के समाज के कल्याण और सामाजिक न्याय का रास्ता सुझाया था । “2015 में उन्होंने न्यूज़ 85 की नींव रखी। एक ऐसा मंच जहाँ निष्पक्ष, निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता को मजबूत आवाज मिली।
न्यूज़ 85 परिवार के संस्थापक सदस्य के रूप में वे हमारे संरक्षक, मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत रहे।
उनकी वैचारिक स्पष्टता, रचनात्मकता और सामाजिक सरोकारों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता ने हमें हमेशा आगे बढ़ने की ताकत दी।”

हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार और प्रगतिशील आलोचक वीरेंद्र यादव का हृदयगति रुकने से 16 जनवरी 2026 को निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे। उनके निधन से साहित्यिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। इप्टा, जन संस्कृति मंच और प्रगतिशील लेखक संघ के पदाधिकारियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। बैकुंठ धाम में उनके अन्तिम संस्कार के दौरान लाल सलाम के गूंजते नारे उनकी प्रगतिशील विचारधारा और वामपंथी आंदोलन से गहरे जुड़ाव को दर्शाते हैं। उनके अंतिम संस्कार में उनके भाई वरिष्ठ पत्रकार नागेन्द्र, परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ही वरिष्ठ कवि उदय प्रताप सिंह समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रशंसक उपस्थित रहे।

वीरेन्द्र यादव के परिवार में पत्नी, एक पुत्र और पुत्री हैं। उनका जन्म पांच मार्च 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए किया और छात्र जीवन से ही वामपंथी बौद्धिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी शुरू कर दी । वे उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के लम्बे समय तक सचिव एवं ‘प्रयोजन’ पत्रिका के सम्पादक रहे। उन्होंने एलआईसी में नौकरी करते हुए भी प्रगतिशील लेखक संघ में अपनी सक्रियता बनाए रखी। ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ उनकी पहली चर्चित पुस्तक है। वीरेंद्र जी ने कई लेखों का अंग्रेज़ी और उर्दू में भी अनुवाद किया। उन्होंने जान हर्सी की पुस्तक हिरोशिमा का हिंदी अनुवाद किया। प्रेमचन्द सम्बन्धी बहसों और ‘1857’ के विमर्श पर हस्तक्षेपकारी लेखन के लिए वे विशेष रूप से चर्चित रहे।
वीरेंद्र यादव आलोचना की दुनिया में उपन्यास विधा के श्रेष्ठ आलोचक के रूप में चिन्हित किए जाते हैं। आलोचना के क्षेत्र में उन्हें वर्ष 2001 के ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ से सम्मानित किया गया था।

वीरेन्द्र यादव का लेखन दृढ़ वैचारिक प्रतिबद्धता और प्रगतिशील मूल्यों से ओतप्रोत था, जिसने युवा आलोचकों को प्रभावित किया। उनकी आलोचना मुख्यतः कथा-साहित्य, प्रेमचंद विमर्श, दलित-बहुजन चिंतन, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक न्याय पर केंद्रित थी। उनकी आलोचना के केंद्र में मुख्य रूप से तीन उपन्यास रहे हैं- ‘गोदान’, ‘मैला आंचल’ और ‘आधा गांव’। ये तीनों उपन्यास वर्ण-जाति पर आधारित वर्गीय-सामाजिक रिश्ते और साम्प्रदायिक दृष्टि का मुकम्मल आख्यान प्रस्तुत करते हैं। और इस निष्कर्ष पर ले जाते हैं कि बहुसंख्यक मेहनतकश भारतीयों (दलित, पिछड़े, आदिवासी, मुसलमान, महिलाएं) में वह ताकत है, जो इस देश को एक न्यायपरक, समतामूलक और शोषण-उत्पीड़नहीन समाज बना सकती है। वीरेंद्र यादव इन उपन्यासों के माध्यम से अपने समय के ज्वलंत समस्याओं के बुनियादी कारणों और उनके समाधान भी अक्सर प्रस्तुत करते रहते थे। उन्होने प्रेमचंद और गोदान को देखने की एक ऐसी दृष्टि दी, जो उसके पहले की आलोचना में नहीं दिखाई देती थी। उन्होने हिंदी आलोचना को नई दिशा दी। ‘विवाद नहीं हस्तक्षेप’ पुस्तक में भी उनके तमाम हस्तक्षेपकारी लेखों को पढ़ा जा सकता है। वे अपने समय के चर्चित मुद्दों पर बेबाक राय रखते थे। ‘विमर्श और व्यक्तित्व’ पुस्तक में भी उन्होंने अपनी आलोचना दृष्टि का स्पष्ट परिचय दिया है।

वीरेंद्र यादव जहां ब्राह्मणवाद परस्त वामपंथ से टकराते रहे, वहीं जातिवादी सोंच से भी बचते रहे । पिछले कई वर्षों से उनका जद्दोदहद इसके बीच संतुलन कायम करने का रहा है। वह हमेशा संविधान के खिलाफ सोंच रखने वाले सामंतवादियों के विरूध निर्णायक तरीके से वैचारिक स्टैंड लेते रहे। वे कभी गोडसेवादियों-सावरकरवादियों से सटने, मेल-मिलाप कायम करने या उनका कृपापात्र होने की कोई कोशिश करते नहीं दिखे। जैसा कि इन दिनों कई सारे प्रगतिशील, वामपंथी, उदारवादी लोग ऐसा करते हुए दिख रहे हैं और कई चर्चित बुद्धिजीवी अपने अंतिम समय में देखे भी गये हैं।

वे तमाम सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते थे। दरअसल, वे समय की चुनौतियों से जूझने वाले लेखक और पत्रकार थे जो अपनी निर्भीकता के लिए जाने जाते थे। उनमें गलत को गलत और सही को सही कहने का साहस था। वे परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ने वाले लेखक थे। उन्होंने मार्क्सवाद से कभी समझौता नहीं किया तो अपने अग्रज लेखकों और समकालीन लेखकों से भी टकराने में देर नहीं की। वे व्यवस्था की विषमताओं पर सवाल करने वाले लेखक थे।
वे अपनी बात को सटीक और सशक्त रूप में कहने में सक्षम थे। फिर चाहे संवाद किसी भी विषय पर हो …लेकिन उनकी राजनैतिक सामाजिक चेतना के केंद्र में कोई था तो वह थी हाशिए पर पड़ी पीड़ित मानवता।
वह एक स्वजन, न्याय के लिए संघर्षरत वृहत्तर परिवार के हिस्से की तरह थे । राजेंद्र यादव, ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, चौथीराम के बाद अचानक वीरेंद्र यादव का चले जाना साहित्य और आलोचना की दुनिया में, सच्चे अर्थों में एक शून्य पैदा करता है। वे कई सारी ऐसी संभावनाओं को अपने साथ लेकर चले गए, जिसकी हिंदी समाज को बहुत जरूरत है।

“वीरेंद्र यादव जी केवल एक प्रख्यात आलोचक नहीं थे, वे प्रगतिशील आंदोलन के प्रखर योद्धा थे।
“आज उनका अचानक जाना स्तब्धकारी है… दुखद है।

साहित्य जगत ने एक विचारक खो दिया, पत्रकारिता ने एक योद्धा खो दिया, और न्यूज़ 85 परिवार ने अपना मार्गदर्शक खो दिया। लेकिन उनके सपने, उनके विचार, उनकी मूल्य-प्रणाली आज भी जीवित हैं।”

“न्यूज़ 85 परिवार संकल्प लेता है कि हम वीरेंद्र यादव जी के दिखाए रास्ते पर चलते रहेंगे। निष्पक्षता, निर्भीकता और जनता के पक्ष में आवाज उठाते रहेंगे।

आपकी यादें… हमें सामजिक न्याय के मार्ग पर चलने को सदैव प्रेरित करती रहेंगी और मानवीय संवेदनाओं को और मजबूत करेंगी ।”
न्यूज़ 85 परिवार की ओर से “वीरेंद्र यादव जी को अंतिम सलाम! अलविदा ! भावपूर्ण श्रद्धांजलि।p

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