यूजीसी 2026 और बीजेपी, ना माया मिली ना राम

लखनऊ, भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में समानता लाने के नाम पर मोदी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया – यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस 2026। यह नियम एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए थे। लेकिन क्या यह सिर्फ समानता का प्रयास था, या राजनीतिक रणनीति?
सरकार की कोशिश थी ओबीसी, एससी और एसटी वोट बैंक को मजबूत करना, लेकिन इससे उनके पारंपरिक सवर्ण समर्थक नाराज हो गए। परिणाम? सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी। यह कहानी है उस राजनीतिक जुआ की, जहां ना माया मिली ना राम। आइए जानते हैं पूरी कहानी।”
जनवरी 2026 में, यूजीसी ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ अधिसूचित किए। ये नियम कैंपस में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों को संबोधित करने के लिए थे, खासकर एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के लिए। हर संस्थान को ‘इक्विटी कमिटी’ बनानी थी, जो ऐसी शिकायतों की जांच करे।
सरकार का दावा था कि यह कदम समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देगा। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बीजेपी की रणनीति का हिस्सा था। 2024 के लोकसभा चुनावों में, 400 पार के एजेंदे से बहुत पीछे रहने और लोकसभा में पूर्ण बहुमत में ना आने पर, बीजेपी ने ओबीसी,एससी और एसटी समुदायों पर फोकस बढ़ाया ।
2024 के बाद बीजेपी ने समझा—
सत्ता की चाबी सिर्फ सवर्ण वोट में नहीं,
बल्कि पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज में है।”
“यूजीसी 2026 इसी रणनीति का हिस्सा माना गया—
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि
ओबीसी, एससी और एसटी वोटर्स, जो भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा हैं, में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए, बीजेपी ने यूजीसी की नई गाइडलाइंस लागू की
कहा जाता है राजनीति में अगर संतुलन बिगड़ जाए,
तो सत्ता हाथ में होकर भी कुछ हाथ नहीं आता।
यूजीसी 2026 भी कुछ ऐसा ही प्रयोग था—
जिसमें न तो नया वोट बैंक बढ़ा,
और जो पुराना था… वो भी खिसक गया।”
जातियों को जोड़कर भाजपा ने कई वर्षों से सफलताएं हासिल की। पर UGC के नए नियम के जरिए दलितों-पिछड़ों को रिझाना भाजपा को महंगा पड़ गया। यानि यूजीसी 2026 बीजेपी के लिए एक सेल्फ गोल साबित हुआ
– सरकार एससी-एसटी और ओबीसी को अपने पक्ष में करना चाहती थी, लेकिन वह तो पक्ष में हुए नहीं पर इन नियमों से सवर्ण वोटर्स दूर हो गए, जो बीजेपी के कोर बेस हैं।
“मोदी सरकार ने सोचा कि ये नियम ओबीसी और दलित वोटर्स को खुश करेंगे, लेकिन बीजेपी के कोर वोटर , सवर्ण को लगा कि ये नियम उनके खिलाफ हैं, जो हमारे वोट से ही चुनी हुई सरकार लाई है।”
नियम अधिसूचित होते ही देशभर में प्रोटेस्ट्स शुरू हो गए। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, कोलकाता के यूनिवर्सिटीज में सवर्ण छात्रों ने प्रदर्शन किए। बीजेपी के अपने समर्थकों में असंतोष फैल गया। सोशल मीडिया पर #StopUGC2026 ट्रेंड करने लगा।
उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कई स्थानीय बीजेपी नेता इस्तीफा देने लगे, ये कहते हुए कि नियम एकतरफा और सवर्ण-विरोधी हैं।
बीजेपी का कोर वोटर—
जिसने हर आंदोलन में साथ दिया,
उसने पहली बार खुद को अनसुना महसूस किया।”
एक रिएक्शन—
“हमने तो सोचा था ये हमारी सरकार है…”
यह सरकार के लिए सेल्फ गोल साबित हुआ, क्योंकि उनकी मंशा ओबीसी/एससी/एसटीv वोट बैंक को सशक्त बनाने की थी, लेकिन इससे उनका मूल सवर्ण वोट बैंक खिसक गया।
वहीं, यूजीसी 2026 के माध्यम से सरकार ने विपक्ष की ओर भी चारा फेंका था
– उम्मीद थी कि विपक्ष इस जाति-आधारित राजनीति में फंस जाएगा। लेकिन विपक्ष फंसा नहीं;
ज्यादातर विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली या ज्यादा तवज्जो नहीं दिया।
समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने भी ज्यादा हंगामा नहीं किया, बल्कि गोल मोल रिएक्शन दिया।
कई विपक्षी नेताओं ने तो बीजेपी पर आरोप लगाया कि वे असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विवाद पैदा कर रहे हैं
वहीं , प्रोटेस्ट्स इतने तीव्र हुए कि यूजीसी के विरोध में कई पिटीशंस सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। पिटीशनर्स ने कहा कि नियम असंवैधानिक हैं, क्योंकि वे जनरल कैटेगरी को बाहर रखते हैं।
29 जनवरी 2026 को, सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जोयमल्या बागची की बेंच ने नियमों को ‘मिसयूज के लिए सक्षम’ बताया। कोर्ट ने कहा कि ये नियम समाज को बांट सकते हैं और बहुत स्वीपिंग हैं। इसलिए, 2026 नियमों पर स्टे लगा दिया गया, और कहा कि 2012 के नियम जारी रहेंगे। अगली सुनवाई मार्च में होगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही ओबीसी/एससी छात्रों ने जबरदस्त तरीके से रिएक्ट किया।
जैसे हाथ में आई हुई कोई प्रिय चीज निकल गई हो।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा #UGC के नए प्रावधान पर रोक लगाए जाने के विरोध में प्रदर्शन शुरू हो गया है।
सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की लड़ाई ज़िन्दाबाद के नारे लगने लगे
बड़ी संख्या में SC, ST और OBC समाज से जुड़े छात्र सड़कों पर उतर आए हैं।
यह फैसला बीजेपी के लिए एक बड़ा झटका था। उनकी रणनीति फेल हो गई ।
न्यायालय का स्टे भाजपा की भूल के नुकसान को नहीं बचा सका..
राजनीतिक रूप से, बीजेपी को दोहरी मार पड़ी ।
– ओबीसी/एससी वॉटर में जो बढ़ोतरी होनी थी वह तो हुई नहीं,
उल्टा सवर्ण वोटर्स दूर हो गए।”
– ओबीसी/ एससी एसटी नाखुश कि सरकार ने हमारे साथ हकमारी की, और सवर्ण अब बीजेपी को शक की निगाह से देख रहे हैं।।”
यूजीसी 2026 की कहानी बताती है कि राजनीति में संतुलन कितना जरूरी है।
मोदी सरकार की कोशिश थी एक तबके को मजबूत करना, लेकिन इससे दोनों तबकe नाराज हो गया।
विपक्ष ने भी चतुराई से चुप्पी साधी और ट्रैप में नहीं फंसा।
परिणाम?
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और एक असफल रणनीति।
ना माया मिली – मतलब राजनीतिक लाभ जीरो
– ना राम, यानी मूल समर्थकों का विश्वास भी खोया।
“जो वर्ग साधने निकले थे,
वो पूरी तरह जुड़ा नहीं।
और जो पहले से साथ था,
वो खुद को ठगा हुआ मान बैठा।
यूजीसी 2026 का असर क्या यूपी के 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी पड़ेगा?
क्या इससे बीजेपी सबक लेंगी?
या ऐसे प्रयोग जारी रहेंगे ?





