सामाजिक न्याय का वह योद्धा जिसने रामायण को भी सच बताया- पेरियार ललई सिंह यादव

आज जब एक किताब को लेकर तहलका मचा हुआ है संसद तक हिली हुई है। यह घटना मुझे एक ऐसे लेखक की याद दिला रही है, जिसकी एक किताब ने पूरे उत्तर भारत में तहलका मचा दिया था और सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा था।
जी हां हम बात कर रहे हैं एक ऐसे महानायक की, जिन्हें उत्तर भारत का पेरियार कहा जाता है। जिन्होंने ब्राह्मणवाद, जातिवाद और धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ जिंदगी भर संघर्ष किया। जिनकी एक किताब ने पूरे उत्तर भारत में तहलका मचा दिया और सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं उत्तर भारत के पेरियार, समाज सुधारक, विचारक और बहुजन चेतना के प्रखर वाहक ललई सिंह यादव की।
1 सितंबर 1911 को कानपुर देहात के छोटे से गांव कठारा में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे पेरियार ललई सिंह यादव।
बचपन का नाम था लल्ला, जो बाद में ललई हो गया। पिता चौधरी गुज्जू सिंह यादव एक कर्मठ आर्य समाजी थे। माता का नाम मूलादेवी था। परिवार में अंधविश्वास नहीं था, लेकिन जाति व्यवस्था का दबाव जरूर था। 1928 में उन्होंने उर्दू और हिंदी से मिडिल पास किया।
कुछ समय फॉरेस्ट गार्ड रहे, फिर 1933 में ग्वालियर रियासत की शस्त्र पुलिस में कॉन्स्टेबल बने। लेकिन नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखी। 1946 में पुलिस और आर्मी कर्मचारियों का संघ बनाया और अध्यक्ष बने। लेकिन असली क्रांति उनकी नौकरी छोड़ने के बाद शुरू हुई…
विचारधारा का निर्माण – पेरियार, आंबेडकर और बौद्ध धर्म
ललई सिंह जी दक्षिण भारत के महान क्रांतिकारी पेरियार ई.वी. रामासामी से बहुत प्रभावित हुए।
उनकी किताबें पढ़ीं, विचार अपनाए। संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित हुए पढ़ा और जाना
भीमराव आंबेडकर की भीम सेना और विचारों से भी जुड़े।
1967 मैं एक ऐतिहासिक फैसला लिया
उन्होंने हिंदू धर्म त्याग दिया और बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
हजारों दलितों-ओबीसी साथियों के साथ दीक्षा ली।
और सबसे बड़ा फैसला – अपने नाम से यादव शब्द हटा दिया।
क्योंकि वो मानते थे – जाति का नाम तक नहीं होना चाहिए।
इसके बाद वो पेरियार ललई सिंह बौद्ध कहलाए।
सबसे बड़ा संघर्ष – सच्ची रामायण और सुप्रीम कोर्ट जीत
लेकिन अभी उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष उनका इंतजार कर रहा था।
1968 में ललई सिंह जी ने क्रांतिकारी पेरियार ई.वी. रामासामी की किताब “The Ramayana: A True Reading” का हिंदी अनुवाद किया – नाम रखा “सच्ची रामायण”।
इस किताब में रामायण को पारंपरिक नजरिए से नहीं, बल्कि शूद्रों, दलितों, स्त्रियों के शोषण के नजरिए से देखा गया।
किताब छपते ही आग लग गई।
हिंदू संगठनों ने विरोध किया,
यूपी सरकार ने 1969 में किताब जब्त कर ली और बैन लगा दिया।
लेकिन ललई सिंह जी रुके नहीं।
उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में केस लड़ा।
1971 में हाईकोर्ट ने बैन हटा दिया।
यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट गई।
और 26 सितंबर 1976 को ऐतिहासिक फैसला आया –
जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर, पी.एन. भगवती और सैयद मुर्तजा फजल अली की बेंच ने कहा:
“किताब पर बैन गलत है। अभिव्यक्ति की आजादी महत्वपूर्ण है।”
ये जीत सिर्फ एक किताब की नहीं थी – ये बहुजन समाज की, सामाजिक न्याय की जीत थी।
पेरियार ललई सिंह ने – नाटक, लेखन और प्रकाशन के जरिए सामाजिक न्याय की लड़ाई जारी रखी
ललई सिंह जी ने कई विवादास्पद लेकिन क्रांतिकारी किताबें लिखीं और प्रकाशित कीं।
उनके प्रसिद्ध नाटक – शंबूक और एकलव्य – जिनमें दलित पात्रों को नायक बनाया।
उन्होंने अशोक पुस्तकालय नाम से प्रकाशन शुरू किया।
पेरियार की कई किताबें हिंदी में अनुवादित की।
उनका पूरा जीवन ब्राह्मणवाद विरोध, जाति उन्मूलन, स्त्री-पुरुष समानता और मानवतावाद के लिए समर्पित रहा।
7 फरवरी 1993 को 81 वर्ष की उम्र में उनका परिनिर्वाण हुआ।
लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है।
बहुजन समाज के लिए वो बाइबिल की तरह हैं।
“सच्ची रामायण” आज भी गरीबों, पिछड़ों, दलितों के लिए प्रेरणा है।
उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर एससी एसटी ओबीसी और हाशिए पर पड़ा समाज उनको याद करता है उनके कार्यक्रम होते हैं।
ललई सिंह यादव जी ने आजीवन सामाजिक न्याय, समानता, तर्कवाद और शोषण के विरुद्ध संघर्ष किया।
उन्होंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और पेरियार ई.वी. रामासामी के विचारों को उत्तर भारत में जन-जन तक पहुँचाने का ऐतिहासिक कार्य किया।
उनका साहस, वैचारिक दृढ़ता और सामाजिक परिवर्तन के प्रति समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणा है।
नई पीढ़ी को उन्हें पढ़ना चाहिए, समझना चाहिए।
क्योंकि जब तक जाति है, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।
और ललई सिंह जी जैसे लोग हमें रास्ता दिखाते रहेंगे।
आज आवश्यकता है कि हम उनके विचारों को पढ़ें, समझें और समाज में लागू करें — यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
पेरियार ललई सिंह यादव सिर्फ एक नाम नहीं – एक विचार हैं, एक क्रांति हैं।
जय भीम! जय पेरियार! जय बौद्ध!
सामाजिक न्याय जिंदाबाद!
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धन्यवाद! नमो बुद्धाय!
जय भीम! जय संविधान!





