बिना लॉ पढ़े सुप्रीम कोर्ट में जीता केस, अब EWS कोटे से डॉक्टर बनेंगे अथर्व चतुर्वेदी

नई दिल्ली, यह प्रेरणादायक कहानी है मध्यप्रदेश के जबलपुर के रहने वाले एक ऐसे छात्र की, जिसने अपने अधिकार के लिए हार नहीं मानी और देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया।

अथर्व चतुर्वेदी एक साधारण परिवार से आते हैं। उन्हें टीवी देखना, क्रिकेट खेलना और पढ़ाई करना पसंद है। 12वीं के बाद उनके पास इंजीनियरिंग और मेडिकल — दोनों क्षेत्रों में जाने का मौका था, लेकिन उन्होंने डॉक्टर बनने का सपना चुना।

NEET पास किया, फिर भी नहीं मिला प्रवेश

अथर्व ने NEET परीक्षा दो बार उत्तीर्ण की और 530 अंक हासिल किए। वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी में आते थे, इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल जाएगा।

लेकिन समस्या तब सामने आई जब निजी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन की प्रक्रिया शुरू हुई। राज्य में निजी संस्थानों में EWS आरक्षण को लेकर स्पष्ट नीति ही नहीं थी। योग्यता होने के बावजूद उनका प्रवेश अटक गया।

कानून की पढ़ाई बिना किए लड़ ली कानूनी लड़ाई

अथर्व ने हार नहीं मानी। वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचे और खुद अपनी बात रखी। उनकी दलीलें सुनकर अदालत ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि उन्हें वकील बनना चाहिए, डॉक्टर नहीं।

यह बात उनके दिल में लग गई — और उन्होंने तय किया कि वे अपने डॉक्टर बनने के सपने के लिए आख़िरी तक लड़ेंगे।

पिता से सीखी कोर्ट की बारीकियां

अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी पेशे से वकील हैं। लॉकडाउन के दौरान जब कोर्ट की सुनवाई ऑनलाइन होने लगी, तब अथर्व ने घर बैठकर पूरी प्रक्रिया देखी और सीखी —

याचिका कैसे बनती है

दस्तावेज़ कैसे अपलोड होते हैं

दलील कैसे रखी जाती है

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) खुद तैयार की और ऑनलाइन दाखिल कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में खुद रखी दलील

सुनवाई के दौरान जब बेंच उठने ही वाली थी, तब अथर्व ने विनम्रता से कुछ मिनट का समय मांगा। उन्हें मौका मिला और उन्होंने अपने तथ्य स्पष्ट रूप से रखे।

कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और मध्यप्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि EWS श्रेणी के पात्र छात्रों को प्रोविजनल MBBS प्रवेश दिया जाए।

यह फैसला अथर्व के लिए जीवन बदल देने वाला साबित हुआ।

परिवार और शिक्षकों का योगदान

अथर्व की सफलता में उनके परिवार का बड़ा योगदान रहा। पिता ने कानूनी मार्गदर्शन दिया, मां ने घर की जिम्मेदारी संभाली। स्कूल की शिक्षिकाओं ने पढ़ाई और भाषा पर उनकी पकड़ मजबूत की।

पढ़ाई में भी रहे आगे

अथर्व ने 12वीं में गणित, जीवविज्ञान, अंग्रेज़ी और कंप्यूटर जैसे कठिन विषय चुने। उन्होंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा भी पास की, लेकिन मेडिकल का सपना नहीं छोड़ा।

 

अभी बाकी हैं कुछ चुनौतियां

अदालत ने कॉलेज आवंटन का आदेश दे दिया है, लेकिन निजी कॉलेजों में EWS फीस संरचना को लेकर अभी भी स्पष्टता नहीं है। परिवार को फीस को लेकर चिंता है। यह कहानी सिर्फ एक छात्र के प्रवेश की नहीं, बल्कि हक के लिए लड़ी गई लड़ाई की कहानी है।

एक ऐसे युवा की कहानी, जिसने निराशा को संघर्ष में बदला और व्यवस्था के सामने झुकने से इंकार कर दिया।

 

 

Related Articles

Back to top button