सांसदों और विशेषज्ञों ने मिलकर बनाया स्ट्रीट डॉग प्लान

नई दिल्ली, हाल ही में आए स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) फैसले के बाद देशभर में स्ट्रीट डॉग प्रबंधन को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी मुद्दे पर सांसदों, कानूनी विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य था इस समस्या का मानवीय, संवैधानिक और राष्ट्रीय स्तर का समाधान तलाशना।
बैठक में माना गया कि फैसले के बाद समाज दो हिस्सों में बंटता दिख रहा है। एक ओर वे लोग हैं जो समुदाय के कुत्तों की देखभाल करते हैं, और दूसरी ओर वे लोग जो उन्हें स्थायी रूप से हटाने की मांग कर रहे हैं। इस बढ़ते तनाव के कारण कई जगह कुत्तों के खिलाफ हिंसा और फीडर्स पर हमलों की घटनाएँ भी सामने आई हैं।
दो बड़ी सच्चाइयाँ सामने आईं
एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) प्रोग्राम को पर्याप्त फंड और संसाधन नहीं मिले।
सभी स्ट्रीट डॉग्स को स्थायी शेल्टर में रखना न व्यावहारिक है, न मानवीय।
पैनल ने कहा कि कुत्तों को मारना (कुलिंग) समाधान नहीं है। स्थायी समाधान है- नसबंदी, टीकाकरण, जिम्मेदार प्रशासन और जनजागरूकता।
पैनल के प्रमुख वक्तव्य
रेणुका चौधरी, सांसद (INC)
उन्होंने कहा कि जानवरों पर क्रूरता समाज के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने बताया कि एडॉप्शन कैंपेन के माध्यम से 120–130 इंडी कुत्तों को गोद लिया गया, जिससे साबित होता है कि मानवीय समाधान संभव है। उन्होंने अवैध ब्रीडिंग और जागरूकता की कमी पर भी चिंता जताई।
प्रियंका चतुर्वेदी, सांसद (Shiv Sena UBT)
उन्होंने कहा कि मानव–कुत्ता संघर्ष एक वास्तविक समस्या है, जिसे जिम्मेदारी से सुलझाना होगा। उन्होंने नगरपालिकाओं के खर्च का ऑडिट, डेटा डैशबोर्ड और टेक्नोलॉजी (AI) के उपयोग पर जोर दिया। साथ ही सभी विभागों और संस्थाओं के मिलकर काम करने की जरूरत बताई।
अनीश गावंडे, सांसद (NCP)
उन्होंने कहा कि समस्या का बड़ा कारण प्रशासनिक लापरवाही है। उन्होंने ABC प्रोग्राम को सही तरीके से लागू करने पर जोर देते हुए इसे स्थायी समाधान बताया।
अंजलि गोपालन, सामाजिक कार्यकर्ता
उन्होंने कहा कि NGOs मॉडल दिखा सकते हैं, लेकिन मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है। उन्होंने एडॉप्शन और सख्त ब्रीडिंग नियंत्रण को प्रभावी समाधान बताया।
एडवोकेट पौलोमी पाविनी शुक्ला
उन्होंने पशु कल्याण और बाल कल्याण को आपस में जुड़ा बताया। उन्होंने बड़े पैमाने पर शेल्टर बनाने को अव्यावहारिक बताया और सामुदायिक नसबंदी मॉडल को प्रभावी समाधान कहा।
रॉबिन सिंह, पीपल फार्म
उन्होंने गांव-गांव आधारित नसबंदी मॉडल का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इससे कुत्तों की आबादी और आक्रामकता दोनों नियंत्रित होती हैं। साथ ही बच्चों में करुणा शिक्षा पर जोर दिया।
एडवोकेट ऐश्वर्या सिंह, दिल्ली हाई कोर्ट
उन्होंने मानव और पशु कल्याण को परस्पर जुड़ा बताया। उन्होंने डॉग बाइट के बाद सही इलाज की जानकारी की कमी पर चिंता जताई और जागरूकता अभियान की जरूरत बताई।
अनिल गोस्वामी, RWA जंगपुरा
उन्होंने RWAs को एकजुट होकर नगरपालिकाओं से जवाबदेही मांगने की अपील की। उन्होंने “Each One, Teach One” के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने का संदेश दिया।
बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय
ABC प्रोग्राम के लिए तुरंत और पर्याप्त फंड
नगरपालिकाओं के खर्च में पारदर्शिता और डैशबोर्ड सिस्टम
केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय
अवैध ब्रीडिंग और परित्याग पर सख्त कार्रवाई
टीकाकरण और डॉग बाइट जागरूकता अभियान
बच्चों में करुणा और सह-अस्तित्व की शिक्षा
न्यायपालिका के लिए विशेषज्ञ सलाहकार समिति का गठन
निष्कर्ष
पैनल ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा “जानवर बनाम इंसान” नहीं है। यह शासन, जिम्मेदारी, करुणा और वैज्ञानिक नीति का विषय है। भारत के पास समाधान की कमी नहीं है — कमी है सही क्रियान्वयन की। बैठक का सामूहिक संदेश स्पष्ट था- डर और टकराव से आगे बढ़कर, करुणा, पारदर्शिता और सहयोग के साथ राष्ट्रीय स्तर का समाधान बनाया जाए।





