पेन, 15 – 85 और कांशीराम

“भारत… विविधताओं से भरा एक महान देश। यहाँ करोड़ों लोग अपने श्रम, मेहनत और प्रतिभा से इस देश को आगे बढ़ा रहें हैं।
लेकिन क्या इन मेहनतकश लोगों को उतनी ही ताकत और सम्मान मिला जितना वे deserve करते हैं?” भारत… दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। लेकिन क्या इस लोकतंत्र में मेहनत करने वाले लोगों के हाथ में सचमुच ताकत है?”
“आज हम आपको एक ऐसा उदाहरण बताएंगे जो एक साधारण कलम से शुरू होता है…किन भारत की राजनीति और समाज को समझने का बड़ा दर्शन बन जाता है।” “15 मार्च 1934 को पंजाब में जन्मे कांशीराम ने देखा कि समाज का बड़ा हिस्सा मेहनत तो करता है, लेकिन सत्ता और नीति निर्णयों में उसकी भागीदारी बहुत कम है।
“उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया —वंचित और बहुजन समाज को जागरूक करना, संगठित करना और उन्हें उनकी राजनीतिक ताकत का एहसास कराना।“अब चूंकि कांशीराम केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे। वे जटिल सामाजिक सवालों को बेहद सरल उदाहरणों से समझाते थे।” मान्यवर कांशीराम जी अपने भाषणों में जटिल सामाजिक-राजनीतिक बातों को समझाने के लिए सरल उदाहरण देते थे। उनमें से एक प्रसिद्ध उदाहरण “कलम (पेन) का दर्शन” था।
कांशीराम जी अपनी जेब में रखा पेन दिखाते थे और लोगों से पूछते थे।
“बताइए… ये क्या है?
लोगों की आवाज आती थी- पेन
कांशीराम जी पूछते, इसका क्या काम है
लोगों की आवाज आती – लिखना
कांशीराम जी फिर पूछते, “बताइए… यह कलम कैसे लिखती है?”
लोगों की आवाज आती-
“स्याही से…।”
कांशीराम:
“लेकिन दिखता क्या है?”
लोगों की आवाज आती-
“पेन का कवर।”
नरेशन इसके बाद कांशीराम जी समझाते थे कि पेन का असली काम लिखना है और लिखने का काम स्याही करती है, न कि ऊपर का कवर।
“अगर कवर हटा दिया जाए… तब भी पेन लिख सकता है।
लेकिन अगर स्याही खत्म हो जाए… तो पेन बेकार हो जाता है।”
“कांशीराम का यह उदाहरण केवल पेन के बारे में नहीं था…
यह भारतीय समाज के बारे में था।”
पेन के ऊपर का हिस्सा- पेन कवर → यानि 15% भारतीय समाज का वह प्रभुत्व वर्ग जिसके हाथ में सत्ता है
और पेन का नीचे का हिस्सा- स्याही वाला हिस्सा- यानि 85% भारतीय समाज का वह बहुजन वर्ग जो श्रम करता है, उत्पादन करता है, लेकिन सत्ता मे उसकी हिस्सेदारी नही है।
“कांशीराम कहते थे —
पेन में लगभग 85% हिस्सा वह है जो असली काम करता है और लगभग 15% हिस्सा केवल ऊपर का कवर है, जो दिखाई देता है लेकिन असली काम नहीं करता। “लेकिन अक्सर वही कवर लोगों को दिखाई देता है।”
“इसी तरह समाज में भी लगभग 85 प्रतिशत लोग मेहनत करते हैं। वे खेतों में काम करते हैं, फैक्ट्रियों में काम करते हैं, देश की अर्थव्यवस्था को चलाते हैं।” “लेकिन सत्ता और फैसलों पर उनकी कोई नियंत्रण नही होता है, कोई हिस्सेदारी नही होती है। सत्ता और फैसलों पर 15 प्रतिशत लोगों का नियंत्रण दिखाई देता है।”
कांशीराम जी इस उदाहरण को बहुजन समाज से जोड़ते हुए कहते थे—
भारत में लगभग 85% मेहनतकश लोग (दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और श्रमिक वर्ग) समाज की असली ताकत हैं। लेकिन सत्ता और संसाधनों पर उनका नियंत्रण नही है। वहीं, मात्र 15% प्रभुत्वशाली वर्ग, सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण रखता है।
“कांशीराम का ‘कलम दर्शन’ वास्तव में सामाजिक संरचना को समझाने का तरीका था।
“कांशीराम कहते थे कि देश के लगभग 85 प्रतिशत मेहनतकश देश की ताकत हैं।”
“लेकिन सत्ता और संसाधनों पर अक्सर 15 प्रतिशत लोगों का नियंत्रण दिखाई देता है।”
वे बताते थे कि समाज में मेहनत करने वाले लोग ही असली ताकत होते हैं।”
उनका तर्क था कि: “जो समाज असली काम करता है, वही असली ताकत है। लेकिन अगर वह संगठित नहीं होगा तो ऊपर का छोटा हिस्सा ही उस पर हुकूमत करता रहेगा।”
“कांशीराम इस उदाहरण से बहुजन समाज को यह समझाना चाहते थे कि—
ताकत आपके पास है, लेकिन जब तक आप संगठित नहीं होंगे, तब तक आपकी ताकत का उपयोग दूसरे करते रहेंगे।”
“जब 85 प्रतिशत लोग जाग जाएंगे संगठित हो जाएंगे…
तो लोकतंत्र की असली ताकत सामने आएगी।”
“कांशीराम का संदेश साफ था—
“जब मेहनत करने वाले लोग अपनी शक्ति पहचान लेते हैं…
तब इतिहास बदल जाता है।”
अगर समाज अपनी ताकत पहचान ले…
तो लोकतंत्र की दिशा बदल सकती है।”
“उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में केवल वोट देना ही पर्याप्त नहीं है।
जरूरी है कि बहुजन समाज खुद अपने भविष्य को लिखे।”
“कलम का यह दर्शन केवल एक उदाहरण नहीं था…
यह एक सामाजिक संदेश था।”
“एक ऐसा संदेश जो लोगों को अपनी ताकत पहचानने और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा देता है।”
इस उदाहरण के माध्यम से कांशीराम जी तीन बातें समझाते थे:
संगठन की जरूरत – बहुजन समाज को एकजुट होना चाहिए
राजनीतिक जागरूकता – अपनी ताकत पहचाननी चाहिए
सत्ता में भागीदारी – लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए
“एक साधारण कलम…
और उससे निकला एक असाधारण विचार।”
“यह विचार लोगों को अपनी ताकत पहचानने का संदेश देता है।”
कांशीराम जी का “कलम दर्शन” यह बताता है कि समाज की असली शक्ति अक्सर वही लोग होते हैं जो मेहनत करते हैं। लेकिन जब तक वे अपनी शक्ति को पहचानकर संगठित नहीं होते, तब तक कम संख्या वाला वर्ग सत्ता पर काबिज रहता है।
“कभी-कभी इतिहास बदलने के लिए बड़ी चीज़ों की नहीं…
बस एक छोटी-सी कलम और एक बड़ी सोच की जरूरत होती है।”
मान्यवर कांशीराम जिन लोगों के बीच काम कर रहे थे, जिन्हें जगा रहे थे उसका बहुसंख्यक हिस्सा गरीब और कम पढ़ा-लिखा था. उन्हें उनकी ही भाषा में समझाना जरूरी था, तभी वो कांशीराम जी की बात समझ पाते. इस लिहाज से कांशीराम जी ऐसे-ऐसे किस्से, उदाहरण और नारे ढूंढ़ लाते, जिससे बहुजन समाज के लोग उनकी बात आसानी से समझ जाते थे.
अपने कैडर में मान्यवर कांशीराम किस्सों, उदाहरण और नारों का बहुत प्रयोग करते थे. क्योंकि इस के जरिए तमाम लोग मान्यवर की बात को बड़ी आसानी से समझ जाया करते थे. जैसे बाबासाहेब को वह टाई वाले बाबा कहते थे तो ऐसे ही ज्योतिबा फुले को पगड़ी वाले बाबा कह कर संबोधित किया करते थे.
जब वो बहुजन समाज को इनके बारे में बताते तो ऐसे संबोधन सुनकर लोग तुरंत समझ जाते कि आखिर मान्यवर किसके बारे में बात कर रहे हैं. एसे ही मान्यवर काँशीराम जी की बहुत सी महत्वपूर्ण बातें हैं जिन्हे हम आपसे शेयर करते रहेंगे।





