भारत में रोजगार की नई हकीकत: डिग्री से ज्यादा मायने रखती हैं स्किल्स

भारत इस समय तेज़ी से बदलती अर्थव्यवस्था के दौर से गुजर रहा है। नई तकनीक, डिजिटल सेवाएं और उभरते उद्योग काम करने के तरीकों और करियर बनाने के रास्तों को बदल रहे हैं। ऐसे समय में सिर्फ डिग्री हासिल करना ही अच्छी नौकरी पाने के लिए काफी नहीं है। आज असली सवाल यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को आत्मविश्वास और कौशल के साथ काम करने के लिए तैयार कर रही है।

डिग्री है, लेकिन कौशल की कमी

हर साल देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से लाखों छात्र ग्रेजुएट होते हैं। लेकिन कई कंपनियां अब भी यह कहती हैं कि बड़ी संख्या में ग्रेजुएट छात्र आधुनिक कार्यस्थलों की जरूरतों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते। समस्या डिग्री की कमी नहीं है, बल्कि पढ़ाई और उद्योगों में जरूरी व्यावहारिक कौशल के बीच की दूरी है।

सिर्फ थ्योरी नहीं, प्रैक्टिकल अनुभव भी जरूरी

परंपरागत शिक्षा प्रणाली में ज्यादातर ध्यान कक्षा में पढ़ाई और सैद्धांतिक ज्ञान पर दिया जाता है। यह ज्ञान महत्वपूर्ण तो है, लेकिन अक्सर यह उन वास्तविक परिस्थितियों को नहीं दर्शाता जिनका सामना लोगों को अपने काम में करना पड़ता है। आज कंपनियां ऐसे लोगों को तलाशती हैं जो समस्याओं का समाधान कर सकें, नए माहौल के अनुसार खुद को ढाल सकें और अपने करियर की शुरुआत से ही काम में योगदान दे सकें।

प्रैक्टिकल स्किल्स से बढ़ती है रोजगार क्षमता

इसी वजह से प्रैक्टिकल स्किल्स यानी व्यावहारिक कौशल का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। यूडीएस फाउंडेशन के संस्थापक कृष्ण मोहन पिन्नापराजु का कहना है कि चाहे तकनीक का क्षेत्र हो, लॉजिस्टिक्स, स्वास्थ्य सेवाएं, सर्विस सेक्टर या मैन्युफैक्चरिंग—हर जगह कंपनियां ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास किसी न किसी रूप में काम का अनुभव हो। इंटर्नशिप, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, प्रोजेक्ट आधारित पढ़ाई और वास्तविक कार्यस्थलों का अनुभव युवाओं को आत्मविश्वास और पेशेवर समझ विकसित करने में मदद करता है।

भारत की युवा शक्ति: एक बड़ा अवसर

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। यह जनसंख्या हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है, अगर युवाओं को सही कौशल और प्रशिक्षण मिले। जब शिक्षा में ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण पर भी ध्यान दिया जाता है, तब युवा अपने चुने हुए क्षेत्र में जिम्मेदारियां संभालने के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो जाते हैं।

छोटे शहरों और ग्रामीण युवाओं को भी मौके

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कौशल विकास के अवसर हर जगह उपलब्ध हों। कृष्ण मोहन पिन्नापराजु का कहना है कि प्रतिभा सिर्फ बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी मौजूद है। कई प्रतिभाशाली युवाओं को सिर्फ इसलिए अवसर नहीं मिल पाते क्योंकि उन्हें प्रशिक्षण, मार्गदर्शन या उद्योगों के अनुभव का मौका नहीं मिलता। यदि कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए और प्रैक्टिकल सीखने के अवसर बढ़ाए जाएं, तो यह प्रतिभा देश की कार्यशक्ति का हिस्सा बन सकती है।

शिक्षा और उद्योगों के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी

इस चुनौती से निपटने के लिए शैक्षणिक संस्थानों और उद्योगों को मिलकर काम करना होगा। कॉलेजों को उद्योगों के साथ मजबूत साझेदारी करनी चाहिए ताकि छात्रों को वास्तविक प्रोजेक्ट्स पर काम करने और विशेषज्ञों से सीखने का मौका मिले। इससे शिक्षा को अर्थव्यवस्था की बदलती जरूरतों के अनुसार प्रासंगिक बनाया जा सकता है।

लगातार सीखना ही भविष्य की कुंजी

साथ ही छात्रों को भी यह समझना होगा कि आज के समय में लगातार सीखते रहना बेहद जरूरी है। नए कौशल सीखना, ज्ञान बढ़ाना और बदलाव के अनुसार खुद को तैयार रखना ही उन्हें आगे बढ़ने में मदद करेगा।

शिक्षा का असली उद्देश्य

कृष्ण मोहन पिन्नापराजु जी का कहना हैं कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ डिग्री हासिल करना नहीं होना चाहिए। इसका असली मकसद युवाओं को काम करने, नवाचार करने और समाज में योगदान देने के लिए सक्षम बनाना है। जब ज्ञान और व्यावहारिक कौशल एक साथ आते हैं, तभी शिक्षा वास्तव में अवसरों का रास्ता बनती है।

ये फोटो के साथ मोहन जी बाईट लगा देना 

“समस्या डिग्री की कमी नहीं है, बल्कि पढ़ाई और उद्योगों में जरूरी व्यावहारिक कौशल के बीच की दूरी है।”

 

 

 

 

Related Articles

Back to top button