प्रगतिशील आलोचक वीरेंद्र यादव का हृदयगति रुकने से निधन , अंतिम संस्कार आज

लखनऊ, हिन्दी साहित्य के प्रख्यात और प्रगतिशील आलोचक वीरेंद्र यादव का हृदयगति रुकने से शुक्रवार को निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे।लखनऊ मे इंदिरा नगर स्थित आवास पर सुबह अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें लारी कार्डियोलॉजी ले जाया गया लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। पिछले कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य खराब था। उनके भाई नागेंद्र प्रताप ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार शनिवार को सुबह 10 बजे बैकुंठ धाम में किया गया जाएगा।

वीरेन्द्र यादव के परिवार में पत्नी, एक पुत्र और पुत्री हैं। साहित्यकार वीरेन्द्र यादव का जन्म पांच मार्च 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में हुआ। वे उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के लंबे समय तक सक्रिय सदस्य और सचिव रहे। उन्होंने प्रयोजन पत्रिका का संपादन भी किया, जिसमें वैचारिक हस्तक्षेप और जन-मुद्दों पर उनका गहन लेखन छपता रहा। उनकी आलोचना मुख्यतः कथा-साहित्य, प्रेमचंद विमर्श, दलित-बहुजन चिंतन, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक न्याय पर केंद्रित थी। उन्होंने जान हर्सी की पुस्तक हिरोशिमा का हिंदी अनुवाद भी किया। वीरेन्द्र यादव का लेखन दृढ़ वैचारिक प्रतिबद्धता और प्रगतिशील मूल्यों से ओतप्रोत था, जिसने युवा आलोचकों को प्रभावित किया।

उनके निधन से साहित्य दुनिया ने एक महत्वपूर्ण चिंतक और मार्गदर्शक और मैंने पांच दशकों तक साथ रहे एक गंभीर सहयात्री एवं दोस्त खो दिया है।उनके निधन की खबर सुनकर बड़ी संख्या में साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी उनके घर पंहुचे।

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