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मूवी रिव्यू: पूर्णा ने बताया लड़कियां कुछ भी कर सकती हैं

फिल्म: पूर्णा अवधि: एक घंटा 45 मिनट निर्देशक: राहुल बोस कास्ट: अदिति ईनामदार, राहुल बोस, हीबा शाह रेटिंग: 3.5 बॉलीवुड में बॉयोपिक फिल्मों का बनना नया नहीं है। लेकिन इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां वही फिल्में काम करती है जिसमे बड़े सितारों की चमक हो। फिल्म में अगर कोई बड़ा नाम हो तो उसके हिट होने के चांसेस बढ़ जाते है। अच्छी कहानी के बावजूद अगर फिल्म में कोई बड़ा सितारा ना हो तो फिल्म का कामयाब होना बेहद ही मुश्किल है।

एक सच्ची और अच्छी कहानी से बनी पूर्णा भी एक बॉयोपिक फिल्म है जिसमें कोई बड़ा सितारा नहीं हैं। लेकिन छोटे बजट और बड़े संदेश वाली इस फिल्म को लोगों के बीच लाने के लिए एक्टर-डायरेक्टर राहुल बोस ने कड़ी मेहनत की है। साल 2014 में 13 साल 11 महीने की पूर्णा मालावथ ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का वर्ल्ड रिकॉर्ड  बनाया था। यह फिल्म उन्हीं की जिंदगी पर बनी है। फिल्म पूर्णा की कहानी की शुरुआत होती है हैदराबाद  के एक दूर-दराज बेहद पिछड़े हुए छोटे से गांव से।

जहां दो चचेरी बहनें पूर्णा और प्रिया को पढ़ाई करने का शौक तो है लेकिन स्कूल की फीस न देने की वजह से स्कूल की क्लास में नहीं बैठने दिया जाता और दोनों को स्कूल की सफाई करनी पड़ती है। घर की माली हालत को देखते हुए दोनों घर से भागकर गांव से दूर बने सरकारी स्कूल में पढ़ने जाना चाहती हैं। क्योंकि वहां पढ़ाई के साथ खाना-पीना फ्री है। भागने का प्लान फ्लॉप हो जाता है और घरवाले प्रिया की शादी करा देते है। लेकिन गरीबी और कम उम्र पूर्णा को शादी की सजा से बचा लेती है।

पूर्णा के पिता बेटी की बात मानते हुए उसे सरकारी स्कूल में दाखिल करा देते है। यहीं से पूर्णा की किस्मत बदलती है क्योंकि आईपीएस ऑफिसर प्रवीण कुमार  पुलिस की ड्यूटी लेने की बजाए सोशल वेलफेयर विभाग में जाना पसंद करता है। उसे लगता है बच्चे देश का भविष्य है ऐसे में शिक्षा का स्तर बेहतर होना जरुरी है। यहां आते ही उसकी मुलाकात पूर्णा और स्कूल में फैले करप्शन से होती है। उसके बाद कैसे यह ईमानदार अफसर करप्शन के खिलाफ लड़ता है और गांव की एक साधारण सी लड़की को पर्वतारोही बनाता है। यही फिल्म की कहानी है।

फिल्म में पूर्णा का किरदार अदिती इनामदार ने निभाया है। अदिती ने फिल्म में बेहतरीन काम किया है। उनके हाव-भाव कमाल के है। पूर्णा की बहन प्रिया का किरदार निभाने वाली एस.मारिया ने भी उनका अच्छा साथ दिया है। डायरेक्शन की कमान संभालने वाले राहुल बोस कैमरे के आगे भी दमदार नजर आए है। धृतिमान चटर्जी, हीबा शाह और ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ने अपने-अपने किरदार के साथ इंसाफ किया हैं।

यह भी पढ़ेः मूवी रिव्यूः ग्रे३ गुलाबी३और गर्दा छुड़ा देने वाली फिल्म है अनारकली ऑफ आरा एक एक्टर के तौर पर राहुल बोस का अभिनय तो लाजवाब है इसमें कोई शक नहीं। लेकिन एक निर्देशक के तौर पर भी राहुल बोस की समझ देखने लायक है। मानवीय भावनाओं को पर्दे पर उकेरने में वो काफी हद तक सफल साबित होते है। छोटे कलाकारों और कम बजट में तैयार यह फिल्म भले ही ज्यादा सुर्खियां न बटोर पाई हो। लेकिन यह अच्छी और सच्ची फिल्म है इसका सब्जेक्ट और इसकी कहानी प्रेरणादायक है। जो लोगों के दिल को छूने की खूबी रखती हैं। ऐसी फिल्म को दर्शकों का साथ अवश्य मिलना चाहिए। इस फिल्म का संगीत दिया है सलीम-सुलेमान ने। जो फिल्म की कहानी को बिना रोके चलता है। जिससे दर्शकों का ध्यान नहीं भटकाता।

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