यूपी में पार्षद मनोनयन: किसकी लगी लाटरी, कौन हुआ नाराज ? ब्राह्मण फर्स्ट, वैश्य सेकेंड, क्षत्रिय थर्ड…?

काफी प्रतीक्षा के बाद योगी सरकार ने भाजपा संगठन की संस्तुति पर नगर निगम, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में पार्षदों को नामित कर दिया है। नगर विकास विभाग की ओर से जारी सूची के अनुसार प्रदेश के कुल 761 नगर निकायों में 2802 सदस्यों को नामित किया गया है।

अधिसूचना के अनुसार नामित सदस्यों को निकायों में सदस्यता ग्रहण कराई जाएगी, जिसके बाद वे सदन की कार्यवाही में भाग ले सकेंगे। निर्वाचित पार्षदों की तरह इन्हें भी सदन में बैठने का अधिकार होता है और जनहित के मुद्दों पर इनसे राय ली जाती है। नगर निगम प्रशासन, मेयर के सुझाव पर विकास निधि में नामित सदस्यों का बजट का कोटा भी निर्धारित कर सकता है, जिसके आधार पर विकास कार्य कराए जाते हैं।

प्रमुख सचिव नगर विकास पी. गुरुप्रसाद ने नगर पालिका अधिनियम, 1916 के प्रावधानों के आधार पर सदस्यों को नामित करने संबंधी अधिसूचना जारी कर दी है। हालांकि अधिसूचना में उनके कार्यकाल की अवधि स्पष्ट नहीं की गई है।

जारी सूची के अनुसार, प्रत्येक नगर निगम में 10-10, नगर पालिका परिषद में 5-5 और नगर पंचायतों में 3-3 सदस्य नामित किए गए हैं। प्रदेश में वर्तमान में 17 नगर निगम हैं। प्रत्येक नगर निगम में 10-10 सदस्यों के हिसाब से कुल 170 सदस्य नामित किए गए हैं। वहीं 200 नगर पालिका परिषदों में 5-5 सदस्यों के अनुसार 1000 सदस्य नामित हुए हैं। इसके अलावा प्रदेश की 544 नगर पंचायतों में 3-3 सदस्यों के हिसाब से 1632 सदस्य नामित किए गए हैं। इस प्रकार कुल 2802 सदस्यों को नामित किया गया है।

प्रदेश सरकार की ओर से नगर निकायों के मनोनीत सदस्यों की सूची जारी होते ही विभिन्न जातीय संगठनों की ओर से जबर्दस्त विरोध किया जा रहा है। विशेष रूप से विभिन्न पिछड़ी और दलित समाज के जातीय संगठनों ने प्रतिनिधित्व न मिलने का हवाला देकर जबरदस्त नाराजगी जाहिर की है।

कोली व जाट समाज के नेताओं ने जानबूझकर नजरंदाज करने पर बीजेपी को सबक सिखाने की बात कही है। वहीं, क्षत्रिय संगठनों ने ऊचित प्रतिनिधित्व न मिलने को जले पर नमक छिड़कना बताया है।

कोली समाज के संगठनों ने सूची में समाज के किसी भी नेता का नाम न आने पर नाराजगी जताते हुये कहा कि भाजपा का असली चेहरा सामने आ गया है। कोली गर्जना महासंघ के संस्थापक सदस्य व भाजपा नेता कैलाश माहौर ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कोली समाज आंख बंद करके बीजेपी को वोट देता है पर मौका आने पर समाज को प्रतिनिधित्व देने की बजाय उसे ठेंगा दिखाया गया है। समाज इस बात को याद रखेगा और समय आने पर माकूल जवाब देगा। आगरा में कोली समाज की जनसंख्या 1.50 लाख से अधिक होते हुए भी समाज को नजरअंदाज किया गया।

वहीं, अखिल भारतीय प्रगतिशील जाट महासभा के अध्यक्ष पुरुषोत्तम फौजदार ने कहा कि जानबूझकर जाटों को राजनीतिक रूप से शून्य करने की कोशिश की जा रही है। मनोनीत पार्षदों की सूची में जाट समुदाय की जान बूझकर अनदेखी की है। आवाज न उठाने की वजह से ही बड़े बड़े पदों से जाट नेताओं को हटाने के साथ ही केन्द्रीय आरक्षण छीना गया। समाज को एकजुट होकर इस अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। हक के लिए अब खुद लड़ना होगा।

ओबीसी की प्रमुख जाति यादव समाज के नेताओं की नाराजगी भी सामने आई है।प्रमुख संगठन यादव मंच का कहना है कि यादवों का योगी मंत्रिमंडल से लेकर प्रशासन तक में नाममात्र प्रतिनिधित्व है। सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाली बीजेपी सरकार ने सबसे अधिक आबादी वाले यादव समाज को नगर निकायों के मनोनीत पार्षदों की सूची में भी पूरी तरह इग्नोर किया है।

क्षत्रिय संगठनों ने सूची में कम जगह मिलने को दुर्भाग्यपूर्ण एवं अपमानजनक बताया है। उनका कहना है कि क्षत्रिय समाज इस अपमान को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं करेगा और इसका जवाब आगामी चुनाव में लोकतांत्रिक तरीके से देगा।

क्या सचमुच, दलित व पिछड़ी जातियों को नगर निकायों के मनोनीत पार्षदों की सूची में हाशिये पर रखा गया है। या बात कुछ और है-

आईये समझतें हैं क्या है हकीकत-

प्रदेश के कुल 761 नगर निकायों में 2802 सदस्यों को नामित किया गया है।

नगर निगम + नगर पालिका + नगर पंचायत
= 170 + 1000 + 1632 = 2802
जिसमें सामान्य वर्ग को कुल 79 + 430 + 591 = 1100 सीटें (≈39%),
वहीं ओबीसी को 59 + 374 + 709 = 1142 (≈41%) ,
SC (दलित) को 24 + 163 + 299 = 486 (≈17%)
Minorities को 8 + 31 + 31 = 70 (≈2.5%)

आबादी vs सीट
सामान्य वर्ग
• 79 + 430 + 591 = 1100 (≈39%)
आबादी: 15%
सीट: 39%
👉 +24%
➡️ ढाई गुने से ज्यादा प्रतिनिधित्व

OBC (सबसे बड़ा समूह)
आबादी: 52%
सीट: 41%
👉 -11%
➡️ भारी Under-representation

SC (दलित)
आबादी: 19%
सीट: 17%
👉 -2%
➡️ हल्का Under-representation

मुस्लिम
आबादी: 14%
सीट: 2.5%
👉 -11.5%
➡️ अत्यधिक Under-representation 🔥

सबसे बड़ा गणित (Core Insight)

ब्राह्मण
आबादी: 5%
सीट: 16%
👉 +11%
➡️ 3 गुना से ज्यादा प्रतिनिधित्व

🥈 वैश्य
आबादी: 2%
सीट: 9%
👉 +7%
➡️ 4–5 गुना प्रतिनिधित्व

🥉 क्षत्रिय
आबादी: 5%
सीट: 8%
👉 +3%
➡️ 1.5–2 गुना प्रतिनिधित्व

जिसमें सामान्य वर्ग में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय को प्रमुख हिस्सेदारी मिली है। सामान्य वर्ग में ब्राह्मण समाज को सबसे अधिक प्राथमिकता मिली है। वैश्य समाज दूसरे स्थान पर और क्षत्रिय समाज तीसरे स्थान पर है।
✔️ Top 3 जातियाँ (ब्राह्मण + वैश्य + क्षत्रिय)
आबादी: 5 + 2 + 5 = 12%
सीट: 16 + 9 + 8 = 33%
👉 मतलब:
❗ 12% आबादी → 33% सीट
➡️ लगभग 3 गुना प्रतिनिधित्व

❗ बाकी (OBC + SC + मुस्लिम)
आबादी: 85%
सीट: ~60%
👉 मतलब:
❗ 85% आबादी → सिर्फ 60% सीट

यूपी में मुख्य रूप से लगभग 79 ओबीसी और 72 दलित जातियां हैं। उपजातियों को देखें तो ओबीसी 79 और 72 दलितों में 100+ छोटी-छोटी जातियाँ हैं। जबकि पिछड़ी और दलित जातियों की हर जाति का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत बहुत कम प्रतिनिधित्व मिला है।

जाति स्तर पर अंतिम तस्वीर
👉 अब बिल्कुल साफ:
🔴 Winner (Over-represented)
ब्राह्मण → सबसे ज्यादा लाभ
वैश्य → सबसे ज्यादा अनुपातिक फायदा
क्षत्रिय → स्पष्ट फायदा

🟡 Loser (Under-represented)
OBC → संख्या में सबसे बड़ा, लेकिन सीट कम
SC → थोड़ा कम
मुस्लिम → बहुत कम

अंतिम निष्कर्ष
“12% आबादी वाली तीन अगड़ी जातियाँ (ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय) मिलकर 33% सीट ले रही हैं, जबकि 85% आबादी वाले OBC, दलित और मुस्लिम को अनुपात से काफी कम प्रतिनिधित्व मिला है।” 60%
👉 इस डेटा से स्प।ट है-
✔️ ब्राह्मण first, वैश्य second, क्षत्रिय third
✔️ और बाकी जातियाँ पीछे

कुल मिलाकर, यह पूरी कवायद आगामी चुनावों से पहले वोटबैंक के पुनर्संयोजन और जमीनी स्तर पर संगठन को और धार देने की दिशा में एक अहम कदम के रूप में देखी जा रही है . संगठनात्मक स्तर पर यह कवायद सिर्फ सामाजिक समीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय से इंतजार कर रहे कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की रणनीति का भी हिस्सा है. यूपी में मई 2023 में हुए नगर निकाय चुनाव के बाद से ही भाजपा के कई कार्यकर्ता पार्षद नामित होने की उम्मीद लगाए बैठे थे। हालांकि राजनीतिक कारणों से प्रदेश संगठन ने इस प्रक्रिया को लगभग तीन वर्षों तक टाल दिया। अब संभावित पंचायत चुनाव और अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने संगठन में बदलाव के साथ-साथ निकायों, निगमों और बोर्डों में रिक्त पदों पर कार्यकर्ताओं को नामित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके जरिए पार्टी ने कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने का प्रयास किया है, जिससे चुनावी तैयारियों को गति मिल सके. बीजेपी ने अपने जातीय और क्षेत्रीय संतुलन ka साधने की भी कोशिश की है, जिससे यह संकेत मिलता है कि BJP अब सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधते हुए अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहती है.

भारतीय जनता पार्टी ने नगर निकायों में पार्षदों के नामांकन के जरिए 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है. नगर निकायों के लिए मनोनीत पार्षदों की सूची के अनुसार, बीजेपी ने अपने कोर वोटर ब्राह्मण और बनिया को साधा है और आंकड़ों से स्पष्ट है कि उन्हे सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। लेकिन बीजेपी के लिये केवल ब्राह्मण और बनिया वोट से यूपी विधानसभा का चुनाव जीतना तो दूर विपक्ष मे आना भी मुश्किल होगा> इस हकीकत को समझते हुये पिछड़ों और दलितों को भी जोड़ने की कोशिश की गई है। लेकिन इसे ईमानदार कोशिश नही कहा जा सकता है। उन्हे वो प्रतिनिधित्व नही मिला है जिसके वह हकदार हैं। और सूची जारी होते ही पिछडा दलित अल्पसंख्यक समाज इस खेल को समझ गया है। वह जान गया है कि जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी हिस्सेदारी के फार्मूले को नजर अंदाज किया गया है। इसीलिये दलित पिछड़े जातीय संगठनों का विरोध हो रहा है। वो संकेत दे रहा है कि वोट हमारा राज तुम्हारा अब नही चलेगा।

यूपी की राजनीति में जाति का फैक्टर सबसे अहम है जिसे साधे बिना 2027 के विधानसभा चुनाव की वैतरणी नही पार की जा सकती है। बीजेपी को इसे समझना होगा नही तो पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के साथ ये बेरूखी 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को भारी पड़ सकती है।

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