
जो इतिहासकार महारों और पेशवा फ़ौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारतीय शासकों के युद्ध के तौर पर देखते हैं, तथ्यात्मक रूप से वो ग़लत नहीं हैं। लेकिन विद्वानों के अनुसार, महारों के लिए ये अँग्रेज़ों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी। अंत्यजों यानी वर्णव्यवस्था से बाहर माने गए ‘अस्पृश्यों’ के साथ जो व्यवहार प्राचीन भारत में होता था, वही व्यवहार पेशवा शासकों ने महारों के साथ किया।
कहा जाता है कि ब्राह्मण पेशवाओं ने अपने राज्य में वर्ण व्यवस्था और मनु संहिता को कड़ाई से लागू किया। परिणामस्वरूप अछूतों को थूकने के लिए गले में मटकी और पैरों के निशानों की सफाई के लिए कमर के पीछे झाड़ू बांधना अनिवार्य था। इधर भारत में विदेशी शक्तियां भी सक्रिय थीं। पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसियों के बाद आए अंग्रेजों को भारत में पहले व्यापार और इसके बाद साम्राज्य विस्तार का मौका मिला। अंग्रेजों ने भारत में राजाओं की आपसी फूट ही नहीं बल्कि सामाजिक विषमताओं का भी भरपूर फायदा उठाया।
फ्रांसिस स्टोन्टा के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने मराठा राज्य पर हमला किया। 1 जनवरी, 1818 को भीमा नदी के तट पर पेशवा और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ। अंग्रेजों के अग्रिम मोर्चे पर बांबे नेटिव इन्फेन्ट्री तैनात थी। इसमें करीब 800 सैनिक थे, जिसमें 500 महार सैनिक थे। महार सैनिकों की इस छोटी टुकड़ी ने 28000 सैनिकों वाली शक्तिशाली पेशवा सेना को केवल 12 घंटे में परास्त कर दिया। अंग्रेजों ने इस स्थान पर एक विजय स्मारक बनाया। इसमें शहीद हुए सैनिकों के नाम दर्ज हैं।
1927 में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव जाकर शहीद महारों को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद वे निरंतर विजय स्मारक पर जाते रहे। डॉ.आंबेडकर ने ही भीमा कोरेगांव में दलितों की वीरता और शौर्य के जलसे की शुरुआत की थी। उन्होंने भीमा कोरेगाँव युद्ध जीतने वाले महार सैनिकों की वीरता के प्रति दलितों को प्रेरित किया। उन्होंने इस लड़ाई को जातीय उत्पीड़न के विरुद्ध महारों की जीत के रूप में पेश किया।