आसमान न कभी मेरे लिये सीमा था और न ही मेरे वतन के लिये : शुभांशु शुक्ला

लखनऊ, ग्रुप कैप्टन व आईएसएस से लौटने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने कहा कि आसमान कभी न उनके लिये सीमा था और न ही भारत के लिए।
उन्होने कहा कि जीवन केवल मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं है, यह यात्रा का भी नाम है। उद्देश्य ज़रूरी हैं, सपने ज़रूरी हैं, योजनायें ज़रूरी हैं। लेकिन इन्हें पूरा करने की दौड़ में, प्रक्रिया का आनंद लेना मत भूलिए। “आगे क्या होगा” की चिंता “अभी क्या हो रहा है” की खुशी को ढकने न दें।
मंगलवार को डॉ एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय के 23वें दीक्षांत समारोह में प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने शुभांशु शुक्ला को डीएससी की मानद उपाधि प्रदान किया। इस मौके पर शुभांशु ने मेधावी छात्र- छात्राओं से कहा कि आपके हाथों में जो यह डिग्री है, उसके पीछे है आपके माता-पिता की अनगिनत जागी हुई रातें, शिक्षकों का धैर्य और परिवार के त्याग शामिल है। यह जीवन का सबसे बड़ा सबक है कि “कोई भी अकेले सफल नहीं होता।”
शुभांशु शुक्ला ने कहा “ आज भले ही यह आपको आपकी शैक्षिक यात्रा का अंत लगे, पर दीक्षांत समापन नहीं है, यह तो आपका लॉन्चपैड है। अब तक आपकी ज़िंदगी समय-सारणी, उपस्थिति और परीक्षाओं से बंधी थी। कल से न तो कोई प्राध्यापक आपको डेडलाइन याद दिलाएगा और न ही अंकपत्र बताएगा कि आप अच्छे हैं या नहीं। अब प्रतिक्रिया आपको अवसरों, विश्वास और आपके द्वारा किए गए प्रभाव के रूप में मिलेगी। यह उत्साहजनक भी है और चुनौतीपूर्ण भी।”
उन्होंने कहा “ स्वतंत्रता रोमांचक है, लेकिन जिम्मेदारी भी साथ लाती है। आज के बाद आपके हर चुनाव, आपके जोखिम, आपके विचार और आपके मूल्य केवल आपका भविष्य ही नहीं, बल्कि भारत का भविष्य गढ़ेंगे। डॉ. कलाम ने हमें सिखाया कि सपने वे नहीं जो सोते हुए देखे जाएँ, बल्कि वे हैं जो हमें जागते रखते हैं। ”
शुभांशु शुक्ला ने इस दौरान अपने लखनऊ से एन.डी.ए., भारतीय वायु सेना और फिर गगनयान से अंतरिक्ष मिशन तक के सफ़र को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि “प्रतीक्षा बर्बादी नहीं, बल्कि तैयारी है।” उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय से बाहर निकलते समय, इतनी जल्दी पहुँचने की जल्दी में मत रहिए कि जीना ही भूल जाएँ। हाँ, करियर का पीछा कीजिए, लक्ष्यों का पीछा कीजिए, सपनों का पीछा कीजिए। लेकिन अपने दोस्तों के साथ हँसना मत भूलिए, छोटी-छोटी जीतों का जश्न मनाइए। उन असफलताओं पर भी मुस्कुराइए जिन्होंने आपको सफलता से ज़्यादा सिखाया।
वायुसेना अधिकारी ने युवाओं से कहा “ आप ऐसे समय स्नातक हो रहे हैं जब भारत अपनी अंतरिक्ष यात्रा के सबसे रोमांचक चरण में है। हम इसरो के चंद्रयान-3 मिशन से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाले पहले देश बने। मिशन गगनयान भारतीयों को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी कर रहा है। 2035 तक हमारा लक्ष्य है एक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 तक एक भारतीय का चंद्रमा पर कदम रखना है। उन्होंने कहा कि यह वह भारत नहीं है जो पिछड़कर पकड़ने की कोशिश कर रहा था। यह वह भारत है जो नेतृत्व कर रहा है, नवाचार कर रहा है और भविष्य को आकार दे रहा है। और यह वही भारत है जो आपका इंतजार कर रहा है। हमारे ये लक्ष्य चुनौतीपूर्ण हैं और इसके लिए पूरे राष्ट्र के संसाधन और आप जैसे युवाओं की क्षमता चाहिए।”
शुभांशु ने इस दौरान अपने दो वादों के बारे में बताते हुए कहा कि “मैं मानता हूँ कि भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र हमारे “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को पूरा करने में परिवर्तनकारी शक्ति रखता है। यह सिर्फ़ सपना नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी है जिसे हमें मिलकर निभाना है।” दूसरा भारत का अंतरिक्ष उद्योग अब तेज़ी से उभर रहा है। कुछ साल पहले तक लगभग नगण्य उपस्थिति थी, और आज लगभग 400 स्टार्टअप्स इसमें काम कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में ये संख्या और बढ़ेगी।”
उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी चुनौती प्रशिक्षित और उद्योग-तैयार मानव संसाधन की। उन्होंने कहा “ अक्सर छात्रों को छह महीने या उससे अधिक का अतिरिक्त प्रशिक्षण चाहिए होता है। यह अंतर विश्वविद्यालय स्तर पर भरा जा सकता है। मुझे गर्व है कि एकेटीयू अपने कई परिसरों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन स्पेस” की स्थापना करेगा। ये केंद्र न केवल विशेष प्रशिक्षण देंगे, बल्कि हाथों-हाथ सीखने और उद्योग से सीधे जुड़ने के अवसर भी प्रदान करेंगे। इसके अलावा, एकेटीयू निजी अंतरिक्ष कंपनियों के साथ एमओयू भी करेगा ताकि छात्र नवीनतम तकनीकों को प्रत्यक्ष देख सकें और उनमें योगदान दे सकें।” इस दौरान उन्होंने अपने छह सिद्धांतों को भी साझा किया।





