बच्चे की हिरासत के फैसलों में सिर्फ़ भलाई पर नहीं, कई और बातों पर भी विचार करना चाहिए : उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि बच्चे की हिरासत का फैसला सिर्फ बच्चे की भलाई पर आधारित नहीं हो सकता, बल्कि अदालतों को कई दूसरे ज़रूरी तथ्यों पर भी विचार करना चाहिए, जिसमें माता-पिता का व्यवहार, उनकी वित्तीय क्षमता , रहन-सहन का मानक और बच्चों का आराम तथा शिक्षा शामिल हैं।

शीर्ष न्यायालय ने गुरुवार को जम्मू – कश्मीर उच्च न्यायालय के एक फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें उच्च न्यायालय दो नाबालिग बच्चों की हिरासत उनकी मां को वापस दे दी थी।

न्यायाधीश पंकज मिथल और न्यायाधीश एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि हालांकि बच्चे की भलाई सबसे ज़रूरी बात है, लेकिन यह हिरासत के फैसलों को तय करने वाला एकमात्र कारण नहीं है। न्यायालय ने कहा, “इस बात से कोई विवाद नहीं है कि हिरासत के मामलों में सबसे ज़रूरी बात बच्चों की भलाई है। फिर भी, हिरासत का अंतिम आदेश देते समय अदालत के सामने कई दूसरे तथ्य भी होते हैं। इन कारणों में पार्टियों का व्यवहार, उनकी वित्तीय क्षमता , उनके रहन-सहन का स्टैंडर्ड, साथ ही बच्चों का आराम और शिक्षा शामिल हो सकते हैं।

इसलिए, उच्च न्यायालय का यह कहना पूरी तरह सही नहीं हो सकता कि ऐसे कारक बहुत ज़्यादा ज़रूरी नहीं हैं और नाबालिगों की हिरासत सिर्फ़ उनकी भलाई पर निर्भर करती है। यह अपील एक तलाकशुदा जोड़े (दोनों भारतीय नागरिक हैं) के बीच 2017 और 2019 में पैदा हुए उनके दो नाबालिग बच्चों की हिरासत को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से जुड़ा था।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय हिरासत के मुद्दे पर फैसला करते समय मां के व्यवहार सहित कई अहम हालात पर ध्यान देने में नाकाम रहा। पीठ ने फैसला सुनाया कि उन्हें इस आधार पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि सिर्फ़ भलाई ही निर्णायक है।
इसलिए शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से गुणों के आधार पर विचार करने के लिए भेज दिया। उच्च न्यायालय को मामले का फैसला तेज़ी से, अधिकतम चार महीने के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा अपीलकर्ता की ओर से पेश हुईं, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता अल्ताफ हुसैन नाइक ने प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व किया।

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