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चुनाव में डिजिटल दंगल, चुनौती मे बड़ा अवसर :डिजिटल मीडिया जर्नलिस्ट फोरम

 

नई दिल्ली,  कोरोना के प्रसार ने विधानसभा चुनाव में विजय हासिल करने के लिए राजनैतिक दलों के सामने मुश्किल खड़ी कर दी है। चुनाव आयोग ने 15 जनवरी तक राजनैतिक रैलियों , रोड शो, नुक्कड़ सभाओं पर रोक लगा दी है। चुनाव आयोग ने कहा कि केवल डिजिटल यानि वर्चुअल रैलियों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।

जिस तरह कोरोना के केस लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसी परिस्थिति में ग्राउंड पर जाकर चुनाव प्रचार संभव होता नजर नहीं हो रहा है। आशंका ये है कि कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुये चुनाव आयोग आगे भी रोक बढ़ा सकता है । मतलब साफ है कि विधानसभा चुनाव में इस बार डिजिटल दंगल होगा। सवाल अहम है कि इस ‘डिजिटल दंगल’ के लिए हमारे राजनैतिक दल कितने तैयार हैं? अगर हम पांच राज्यों में मात्र उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बात करें तो  कौन सी पार्टी  कितने पानी में है इसका अंदाजा संबंधित पार्टियों के सोशल मीडिया हैंडल्‍स को देखकर पता चल जाता है।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी यूपी के ट्विटर हैंडल (@bjp4up) को 2.9 मिलियन लोग ,यूपी कांग्रेस के ट्विटर हैंडल (INCUttarPradesh) को 461K लोग , समाजवादी पार्टी के अधिकारिक हैंडल (samajwadiparty) को 2.8 मिल‍ियन और बहुजन समाज पार्टी के ट्विटर हैंडल (@bspindia) को 24.4 K लोग फालो करतें है। वहीं फेसबुक पर बीजेपी यूपी के पेज को 5,076,111, समाजवादी पार्टी के पेज को 3,213,458, कांग्रेस यूपी के पेज को 605,425 लोग फॉलो करते हैं।

बीजेपी इस डिजिटल प्रचार मे सबसे आगे दिख रही है । यहां तककि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्वयं इस बात को स्‍वीकार किया हैं कि उनकी पार्टी डिजिटल प्रचार में कमजोर है। यूपी में जब मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी का ये हाल है तो अन्य दलों की तो आप कल्पना भी नहीं कर सकतें हैं?

इसलिये अब वर्चुअल तरीके से लोगों तक पहुंच बनाने और प्रचार कराने को लेकर राजनीतिक दलों पर दबाव बढ़ गया है।  इस ‘डिजिटल प्रचार’ के लिए दो चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत है- तकनीकी रूप से प्रशिक्षित लोग  और चुनाव में खर्च करने के लिये मजबूत वित्तीय स्थिति। बीजेपी इस लड़ाई मे सबसे आगे इसलिये दिख रही है क्योंकि  उसके पास पहले से ही बहुत इन्फ्रास्ट्रक्चर है। इलेक्शन बॉन्ड भी उन्हें ही सबसे ज्यादा मिलते हैं, इसलिये चुनाव में खर्च करने के लिये उसकी वित्तीय स्थिति भी मजबूत है। अत: वर्चुअल रैलियां करने को लेकर  चुनाव आयोग को उन पार्टियों के बारे में भी सोचना चाहिए, जिनके पास वर्चुअल रैली के लिए पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। लेकिन चुनाव आयोग ने प्रतिबंध लगाकर गेंद राजनैतिक दलों के पाले में फेंक दी है।अब बड़े पैमाने पर वोटरों से कनेक्ट होने के लिये एकमात्र उपाय डिजिटल वॉर से चुनावी नैया पार करने का है। निश्चित रूप से ये बड़ी चुनौती है। लेकिन इस चुनौती से निपटा जा सकता है। क्योंकि चुनौती मे अवसर है।

अनुराग यादव 

अध्यक्ष, डिजिटल मीडिया जर्नलिस्ट फोरम

मोबाईल नं0- 9415022994

 

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