IAS में आरक्षित सीटों की चोरी ? सबका विकास, SC, ST, OBC का ….?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जिसकी नींव समानता, न्याय और अवसरों की बराबरी पर रखी गई है। संविधान निर्माताओं का ये निर्णय था कि सदियों से वंचित और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए केवल औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि उन्हें विशेष अवसर देने की आवश्यकता होगी। इसी सोच के तहत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई। यह व्यवस्था केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक मजबूत माध्यम भी है।

प्रशासनिक सेवाएं किसी भी देश की नीति निर्माण और क्रियान्वयन का केंद्र होती हैं। यदि इन सेवाओं में विविधता नहीं होगी, तो नीतियां भी एकतरफा बन सकती हैं। इसीलिए SC, ST और OBC वर्गों की पर्याप्त भागीदारी

प्रशासनिक सेवाओ में सुनिश्चित की गई। जिसके अंतर्गत SC को 15% ST को 7.5 % और ओबीसी को 27% आरक्षण प्रशासनिक सेवा में प्रदान किया गया है। लेकिन 12 फरवरी 2026 को संसद में प्रशासनिक सेवाओं में एससी एसटी ओबीसी की भागीदारी पर CPI-M के राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटस द्वारा पूछे गए प्रश्न के जवाब में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक लिखित उत्तर में, पिछले पांच वर्षों (CSE 2020 से CSE 2024) के दौरान SC, ST और OBC वर्ग से सीधे भर्ती किए गए अधिकारियों का जो डेटा जारी किया है। वह शॉकिग ही नहीं संविधान की मूल भावना पर एक बड़ा आघात है।

देश में IAS, IPS, IFS के 15,169 पद स्वीकृत हैं।
इनकी तुलना में 12,335 पदों पर IAS, IPS और IFS की पोस्टिंग है
और 2,834 पद खाली हैं।

इस तरह लगभग 19 प्रतिशत सिविल सर्वेंट के पद खाली हैं।

IAS में – OBC 245, SC 135, ST 67
IPS में – OBC 255, SC 141, ST 71
IFS में – OBC 231, SC 95, ST 48

2020 से 2024 तक हुई सिविल सेवा की सीधी भर्ती में OBC ~13-14%, SC ~6-7%, ST ~3-4%। है यानि आरक्षण के लक्ष्य से बहुत कम।  ये पिछले 5 सालों मे भारत सरकार द्वारा की गई भर्ती में SC, ST और OBC वर्गों की दशा है। लेकिन कहीं आप कुल IAS कैडर में हुई भर्ती में SC, ST और OBC वर्गों की स्थिति को देखेंगे तो वह और भी शोचनीय है। (जनवरी 2025 डेटा):

SC: सिर्फ 2.42%
ST: 1.2%
OBC: 4.39%
बाकी 90%+ सामान्य वर्ग से।
जब प्रशासनिक सेवाओं में वंचित वर्गों की नियुक्ति निर्धारित आरक्षण से कम होती है, तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं रहता, बल्कि यह सामाजिक न्याय की अवधारणा पर सीधा प्रहार बन जाता है।

यह स्थिति न केवल अत्यंत चिंताजनक है, बल्कि संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। जब निर्धारित आरक्षण के बावजूद सीटें खाली रह जाती हैं या उन्हें सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर दिया जाता है, तो यह सीधे-सीधे हक़मारी का मामला प्रतीत होता है।
जब इन वर्गों के लिए निर्धारित सीटों को पूरी तरह नहीं भरा जाता, तो इसका अर्थ है कि उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। यह केवल संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता को बनाए रखने का एक अप्रत्यक्ष तरीका भी है।
यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं, और इन खामियों की जिम्मेदारी से सरकार बच नहीं सकती।

इस संदर्भ में केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठते हैं। क्या यह केवल प्रशासनिक चूक है या फिर एक प्रकार की नीतिगत लापरवाही? सरकार का यह दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि आरक्षित वर्गों के लिए निर्धारित सीटें पूरी तरह भरी जाएं आरक्षित सीटों की चोरी न हो। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह न केवल संवैधानिक दायित्वों की अवहेलना है, बल्कि सामाजिक असमानता को और गहरा करने वाला कदम भी है।

केंद्र सरकार की जिम्मेदारी केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना भी है। यदि प्रशासनिक सेवाओं में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं हो रहा है, तो यह सीधे-सीधे सरकार की जवाबदेही का विषय बनता है।
सामाजिक प्रभाव

आरक्षण से कम नियुक्तियां केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामाजिक प्रभाव भी पड़ता है। जब वंचित वर्गों को उनके अधिकार नहीं मिलते, तो उनमें असंतोष और निराशा बढ़ती है। यह स्थिति सामाजिक असंतुलन को जन्म दे सकती है।
इसके विपरीत, यदि इन वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिलता है, तो इससे न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, बल्कि समाज में समावेशिता भी मजबूत होती है। प्रशासनिक सेवाओं में विविधता होने से नीतियों में भी विभिन्न दृष्टिकोण शामिल होते हैं, जो देश के समग्र विकास के लिए आवश्यक है।

सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि आरक्षित वर्गों में योग्य उम्मीदवारों की कमी के कारण सीटें खाली रह जाती हैं।
लेकिन, ये तर्क सच्चाई से कोसों दूर, मात्र भ्रमित करने वाला, अपनी गड़बड़ियों को छुपाने वाला और वर्चस्ववादी सोच का प्रतीक है।
यह तर्क मात्र सरकार की आरक्षित वर्गों को लेकर सोंच, उनके प्रति संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

जबकि हकीकत यह है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, शासन और सत्ता में सवर्ण वर्ग का वर्चस्व, मूल्यांकन में पक्षपात, कटऑफ निर्धारण जैसे कारक आरक्षित वर्गों के चयन को प्रभावित कर रहे हैं। कई बार आरक्षित सीटों को “कैरी फॉरवर्ड” करने के बजाय सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर दिया जाता है, जो आरक्षण नीति की भावना के विपरीत है।

मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई लैटरल एंट्री से महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर की जा रही भर्ती में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है,जो इस समस्या को और बढ़ा रही है।

इन सभी कारणों को मिलाकर देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि समस्या उम्मीदवारों की कमी या योग्यता की कमी की नही , बल्कि पूरी व्यवस्था की है।
समाधान के उपाय
• इस समस्या का समाधान केवल आलोचना से नहीं, बल्कि ठोस कदमों से संभव है।
• चयन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए। यदि चयन में किसी प्रकार की अनियमितता या पक्षपात सामने आता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
• आरक्षण से संबंधित नियमों को स्पष्ट और सख्ती से लागू किया जाए।
• सरकार को चाहिए कि वह नियमित रूप से यह समीक्षा करे कि कितनी आरक्षित सीटें भरी गईं और कितनी खाली रह गईं। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाए कि खाली सीटों को बिना उचित कारण के सामान्य वर्ग में न बदला जाए। और कोई भी आरक्षित सीट बिना उचित कारण के खाली न रहे।

प्रशासनिक सेवाओं में SC, ST और OBC वर्गों की नियुक्ति निर्धारित आरक्षण से कम होना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के साथ गंभीर अन्याय है। केंद्र सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए ठोस कदम उठाने होंगे। आरक्षण केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक वादा है—उन लोगों के लिए, जो सदियों से पीछे रहे हैं। इस वादे को निभाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का कर्तव्य है।
यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं – न्याय की लड़ाई है।
जब तक IAS में सच्चा प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक भारत सच्चा लोकतंत्र नहीं कहला सकता।”

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