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ये भारतीय मीडिया पर संकट का नही बल्कि ट्रांसफार्मेशन का दौर है: अनुराग यादव

देश मे लाकडाऊन के बाद से ही मीडिया के भविष्य को लेकर लगातार निराशाजनक समाचार आ रहें हैं। आर्थिक मंदी का बड़ा असर मीडिया पर पड़ा है। इस मंदी का सीधा असर अखबारों, टीवी और रेडियो को मिलने वाले विज्ञापनों और मीडिया कर्मियों की रोजीरोटी पर पड़ा है।

 वहीं कोरोना वायरस ने अखबारों के सर्कुलेशन को भी समेटने का काम किया है। कोरोना वायरस के संक्रमण के डर से काफी संख्या मे लोगों ने अखबार लेना बंद कर दिया है। जब अखबारों का सर्कुलेशन कम हो गया तो विज्ञापन देने वाले संस्थानों ने भी अपने हाथ खींच लिये। हालात ये हैं कि अखबार भी सिकुड़ कर अब कुछ पन्नों के रह गयें हैं और वो भी नाम मात्र की प्रतियां छाप रहें हैं। अब उनका जोर अपने समाचार पत्र के ई- संस्करण की ओर बढ़ रहा है।

वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया पर भी लाकडाऊन का असर दिखा लेकिन वह प्रिंट की तुलना मे कम है। पहले कि तुलना मे कोरोना काल मे विज्ञापनों मे कमी आयी है। दूसरी खास बात है कि टीवी न्यूज़ चैनल बड़ी तेजी से अपनी विश्वसनीयता खो रहें हैं। न्यूज चैनल का नाम लेते ही लोगों के दिमाग मे यह तय हो चुका है कि ये किस विचारधारा को प्रोत्साहित करता है। लोगों को लगता है कि अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए वे अजीबो-गरीब हरकतें और निर्ऱथक डिबेट कराते हैं।  टीवी पर एंकर किसी पार्टी विशेष के प्रवक्ता से अच्छा उस राजनैतिक पार्टी के एजेंडे की पैरवी करते देखे जा सकतें हैं। अब तो अक्सर टीवी न्यूज चैनलों के झूठ सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर मजाक का विषय बनते दिखाई देतें हैं। टीवी न्यूज चैनलों के एंकरों की एंकरिंग पर लोग टिकटाक बना रहें हैं।

वहीं प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के विज्ञापन और सर्कुलेशन/ टीआरपी पर हुये हमलों का सीधा असर पत्रकारों की नौकरियों पर साफ दिखायी दे रहा है। ये सच है कि लाकडाऊन शुरू होते ही कई मीडिया संस्थानों से नौकरियां जानें की खबरें आना शुरू हुईं  थी जो अबतक थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं।

वहीं अगर हम लाकडाउन के दौरान सोशल या डिजिटल मीडिया की भूमिका की बात करें तो यह कहने मे कोई संकोच नही कि डिजिटल मीडिया ने इस चुनौती का उपयोग एक अवसर के रूप मे किया है और अपनी सार्थकता सिद्ध की है। जहां अखबार सर्कुलेशन कम होने और टीवी चैनल टीआरपी घटने से परेशान हैं, वहीं डिजिटल न्यूज चैनलों, यू-ट्यूब चैनलों आदि की दर्शक संख्या यानि व्यूअरशिप और कमाई बढ़ी है।

डिजिटल मीडिया ने इस संकट की घड़ी मे देश और दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया है। पत्रकारिता के क्षेत्र मे अपने नाम से जुड़ी हीनता को न केवल दूर किया है बल्कि मीडिया के दिग्गजों से लेकर, वरिष्ठ राजनेता, नौकरशाह को अपने प्लेटफार्म पर आने को मजबूर कर दिया है।

डिजिटल मीडिया एक सर्व सुलभ और सबसे प्रभावी जन मीडिया के रूप मे उभरा है, जिसने आम से लेकर खास तक को एक प्रभावशाली प्लेटफार्म दिया है। जहां उसने आम आदमी की समस्याओं को सबसे ज्यादा स्थान दिया है। वहीं जनता मे अपनी विश्वसनीयता बढ़ाई है। पारदर्शिता और सजगता के कारण झूठ और अफवाहों को भी काफी हद तक नियंत्रित किया है।

अब अगर आज अखबार, टीवी चैनलों के हालात खराब हैं और डिजिटल मीडिया के ये तेवर हैं तो बड़ा सवाल ये उठता हैं कि क्या भारत मे मेन स्ट्रीम मीडिया के दिन समाप्त हो गए हैं ?  वैसे मीडिया विशेषज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों ने इस संकट को मीडिया पर अब तक पड़ने वाला सबसे बड़ा संकट करार दिया है और भारतीय मीडिया के दिन लदने की बात कही है।

लेकिन ये भी पूरा सच नही है ? और मेरी राय इसके बिल्कुल विपरीत है। मुझे लगता है कि ये भारतीय मीडिया पर संकट का नही बल्कि उसके ट्रांसफारमेशन का दौर है।

हकीकत ये है कि दशकों से पूंजीवाद, जातिवाद, कारपोरेट कल्चर और सत्ता शीर्ष के शिकंजे में जकड़ा भारतीय मीडिया अब इनके चंगुल से निकल कर आम आदमी की आवाज बनने जा रहा है। अब ये चंद प्रभावशाली लोगों की आवाज न होकर आम आदमी की आवाज बन रहा है, जिसे दबा पाना मुश्किल होगा। और ये ताकत भारतीय मीडिया को तकनीक दे रहा है। तकनीक की ताकत के कारण अब हर वो भारतीय जिसके हाथ मे एक स्मार्टफोन है वह एक पत्रकार की भूमिका मे खड़ा है। उसकी एक छोटी सी फोटो, आडियो या वीडियो रिकार्डिंग डिजिटल मीडिया की तकनीकी ताकत के कारण सत्ता, शासन-प्रशासन पर भारी पड़ रही है। उसके द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किये गये पुराने वीडियो आज सत्ता-शीर्ष के झूठ और बड़बोलेपन को प्रमाण सहित उजागर कर रहें हैं। जबकि आज बड़े से बड़ा पत्रकार भी सत्ता शासन के खिलाफ लिखने या दिखाने की जल्दी हिम्मत नहीं कर सकता हैं।

 कोरोनाकाल की ही अगर हम बात करें तो प्रवासी मजदूरों के पैदल घर लौटने, उनके साथ होने वाले दर्दनाक हादसे डिजिटल मीडिया द्वारा दिखाये जाने के बाद, मेनस्ट्रीम मीडिया की नजर मे आये। गुजरात का धमन-1 वेंटिलेटर कांड डिजिटल मीडिया के कारण ही चर्चा मे आया, नही तो ये खबर कब की दब जाती। और बिहार की ज्योति कुमारी पासवान की 1200 किमी साईकिल चलाकर घायल पिता को घर लाने की अनूठी स्टोरी, मेनस्ट्रीम मीडिया ने नही, डिजिटल मीडिया की कवरेज ने अमेरिका मे इवांका ट्रंप तक पहुंचाई है।

इसलिये हकीकत ये है कि वर्तमान समय भारतीय मीडिया पर संकट का नही बल्कि मीडिया ट्रांसफार्मेशन का दौर है, जिसमें लीड अब डिजिटल मीडिया करेगा और पूरा रूपांतरण हो जाने के बाद भारतीय मीडिया कहीं ज्यादा निष्पक्ष, पारदर्शी, जनकल्याणकारी और प्रभावी रूप मे सामने आयेगा।

अनुराग यादव, 9415022994 अध्यक्ष, डिजिटल मीडिया जर्नलिस्ट फोरम

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