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बहुविवाह के लिए कुरान की हो रही गलत व्याख्या – हाई कोर्ट

gujrat-high-court_s_650_120614102107गुजरात हाई कोर्ट ने आज देश मंे समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) लागू करने की वकालत करते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय मंें पुरूषांे के एक से अध्ािक विवाह करने के प्रावध्ाान का स्वार्थवश दुरूपयोग और इसकी गलत व्याख्या की जा रही हैै।

न्यायमूर्ति जे बी पारडीवाला की अदालत ने मुस्लिम समुदाय के जफर अब्बास मर्चेंट की अर्जी पर सुनवाई करते हुए इस मामले मंे काफी कडी टिप्पणियां की। हालांकि उन्हंे एक पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी करने पर सजा का प्रावध्ाान करने वाली भारतीय दंड संहिता की ध्ाारा 494 के तहत कार्रवाई से राहत दे दी। मर्चेंट के खिलाफ उनकी पहली पत्नी ने यह कहते हुए ध्ाारा 494 के तहत कार्रवाई की मांग की थी कि उन्हांेने उसके जीवित रहते हुए दूसरी शादी कर ली है। मर्चेंट ने हाई कोर्ट मंे दायर अपनी अर्जी मंे कहा था कि उनके खिलाफ इस ध्ाारा के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती क्यांेकि वह मुस्लिम पुरूष है और मुस्लिम पर्सनल लॅा के तहत उन्हंे एक से अध्ािक शादियां करने का अध्ािकार है।
अदालत ने कहा कि पहले के समय मंे कुरान के बहुविवाह का प्रावध्ाान ठीक था पर आज के समय मंे कई मुस्लिम पुरूष स्वार्थवश इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हंै। अदालत ने कहा कि अब समय आ गया हैै जब देश मंे समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए ताकि इस तरह के असंवैध्ाानिक चीजांे को
अदालत ने कहा कि कुरान मंे बहुविवाह की केवल एक ही बार चर्चा है और वह भी सशर्त है पर आज कई पुरूष इस प्रावध्ाान का स्वार्थवश दुयपयोग कर रहे हंै।
अदालत ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ किसी मुसलमान पुरूष को उसकी पत्नी से क्रूरतापूर्ण बर्ताव या उसे घर से बाहर निकाल कर दोबारा शादी करने की इजाजत नहीं देता। पर देश मंे कोई ऐसा कानून अथवा समान नागरिक संहिता नहीं है जो इस पर रोक लगा सके।
अदालत ने कहा कि समान नागरिक संहिता के बारे मंे सरकार को जरूरी कदम उठाने चाहिए। आध्ाुनिक और प्रगतिशील सोच के तहत भारत मंे उक्त चलन को समाप्त करते हुए समान नागरिक संहिता की व्यवस्था होनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॅा मंे चार पत्नी की व्यवस्था संविध्ाानसम्मत नहीं है। बहुविवाह तथा पत्नी की सहमति के बिना एकतरफा ढंग से तलाक देने की व्यवस्था संविध्ाान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले कानून के समक्ष सबकी समानता के मौलिक अध्ािकार तथा अनुच्छेद 15 के तहत किसी से ध्ार्म जाति लिंग आदि के आध्ाार पर भेदभाव नहीं करने के प्रावध्ाानांे के खिलाफ है। अगर इसकी अनुमति दी जाती है तो राज्य महिलाओं के साथ भेदभाव के इस मामले मंे एक सहयोगी बना रहेगा जो उसके अपने ही कानून के खिलाफ है। अदालत ने अपने फैसले मंे कुरान की कई आयतांे तथा जाने माने विद्वानांे के बयानांे का भी जिक्र किया। इसने कहा कि मुसलमानांे के लिए चार पत्नियां रखना कोई मौलिक अध्ािकार नहीं है।
न्यायमूर्ति पारडीवाला ने इस मामले मंे मर्चेंट के खिलाफ ध्ाारा 494 के तहत कार्रवाई नहीं करने का अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि हालांकि उसका कृत्य उक्त ध्ाारा के तहत सजा का पात्र है पर मेरे पास उसे इससे राहत देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

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