सुप्रीम कोर्ट के निजता के अधिकार पर फैसले से, केंद्र सरकार को बड़ा झटका

नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना फैसला सुनाते हुए केन्द्र सरकार को बड़ा झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार  को मौलिक अधिकार घोषित किया है। निजता के अधिकार का मुद्दा केन्द्र सरकार की तमाम समाज कल्याण योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए आधार को अनिवार्य करने संबंधी केन्द्र सरकार के कदम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उठा था।

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इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कुल 21 याचिकाएं दायर की गईं हैं। कोर्ट ने 7 दिनों तक लगातार सुनवाई की थी और इसके बाद 2 अगस्त को फैसला सुरक्षित रखकर 24 अगस्त की तारीख फैसले के लिए निर्धारित की थी।

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चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए अधिकारों के अंतर्गत प्राकृतिक रूप से निजता का अधिकार संरक्षित है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम सप्रे, जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। सभी जस्टिस ने समान विचार व्यक्त किए हैं।

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इससे पहले, पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 18 जुलाई को कहा कि इस मुद्दे पर फैसला करने के लिये नौ सदस्यीय संविधान पीठ विचार करेगी।  कोर्ट ने शीर्ष अदालत की छह और आठ सदस्यीय पीठ द्वारा क्रमश: खडक सिंह और एम पी शर्मा प्रकरण में दी गई व्यवस्थाओं के सही होने की विवेचना के लिये नौ सदस्यीय संविधान पीठ गठित करने का निर्णय किया था। इन फैसलों में कहा गया था कि यह मौलिक अधिकार नहीं है। खडक सिंह प्रकरण में कोर्ट ने 1960 में और एम पी शर्मा प्रकरण में 1950 में फैसला सुनाया था।

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क्या निजता के अधिकार को संविधान में प्रदत्त एक मौलिक अधिकार माना जा सकता है के सवाल पर संविधान पीठ ने तीन सप्ताह के दौरान करीब छह दिन तक सुनवाई की थी। यह सुनवाई दो अगस्त को पूरी हुई थी। सुनवाई के दौरान निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने के पक्ष और विरोध में दलीलें दी गईं।

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इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल, अतिरक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता सर्वश्री अरविन्द दातार, कपिल सिब्बल, गोपाल सुब्रमणियम , श्याम दीवान, आनंद ग्रोवर, सी ए सुन्दरम और राकेश द्विवेदी ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने या नहीं किए जाने के बारे में दलीलें दीं और अनेक न्यायिक व्यवस्थाओं का हवाला दिया था।

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 यह निश्िचत है कि  सुप्रीम कोर्ट के निजता के अधिकार पर दिये गये फैसले से, केंद्र सरकार को बड़ा झटका लगा है।

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