मां की संवेदनशील सोच ने बदली दिशा, ऑटिस्टिक बेटी के अनुभवों से जन्मा खास किताबों का संसार

नयी दिल्ली/नोएडा, कभी-कभी जीवन की कठिन परिस्थितियां ही नई राह दिखा देती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ जब नोएडा में रहने वाली नीति शुक्ला को पता चला कि उनकी छोटी बेटी ऑटिज़्म से प्रभावित है। एक मां के रूप में उन्होंने अपनी बेटी के बेहतर विकास के लिए हर संभव जानकारी और सामग्री खोजने की कोशिश की, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि भारत में विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के लिए उपयुक्त और सरल शैक्षणिक किताबों की भारी कमी है। इसी कमी ने उन्हें एक नयी पहल शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
नीति शुक्ला बताती हैं कि उनकी बेटी अविका शुरू में बुलाने पर प्रतिक्रिया नहीं देती थी, आंखों से संपर्क कम करती थी और अक्सर चिड़चिड़ी रहती थी। जब अविका दो साल की होने से कुछ महीने पहले ऑटिज़्म का पता चला, तो परिवार के सामने कई सवाल खड़े हो गए। उन्हें डॉक्टरों और थेरेपिस्ट से बातचीत के दौरान समझ आया कि छोटे बच्चों में अत्यधिक स्क्रीन टाइम ऑटिस्टिक लक्षणों को बढ़ा सकता है और सामान्य बच्चों में भी संवाद की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
नीति शुक्ला ने इसी अनुभव के आधार पर करीब दो साल पहले ब्रेनलैंड बुक्स की शुरुआत की। इस प्रकाशन का उद्देश्य बच्चों को स्क्रीन से दूर रखते हुए ऐसी गतिविधि-आधारित किताबें उपलब्ध कराना है, जो उनके दिमाग को सक्रिय रखें और सीखने की प्रक्रिया को सहज बनाएं।
नीति शुक्ला का कहना है कि विदेशों में इस तरह की सहायक सामग्री उपलब्ध थी, लेकिन भारत में ऐसी किताबें बहुत कम थीं। उन्होंने अपनी बेटी के साथ बिताए समय और सीख से प्रेरित होकर उन्होंने विशेष बच्चों के लिए किताबें तैयार करनी शुरू कीं। ब्रेनलैंड बुक्स अब तक 50 से अधिक किताबें प्रकाशित कर चुका है। विशेष बच्चों के लिए पहली किताब ‘पिक्चर बुक टू लर्न डेली रूटीन’ रही, जिसमें तस्वीरों के माध्यम से बच्चों को रोज़मर्रा की गतिविधियां सिखाई जाती हैं। इन किताबों में उठना, बाथरूम जाना, दांत साफ करना और नहाने जैसी दिनचर्या को चित्रों के जरिए समझाया जाता है।
नीति शुक्ला का मानना है कि कई ऑटिस्टिक बच्चे अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, इसलिए दृश्य माध्यम उनके लिए ज्यादा प्रभावी होता है। आने वाले समय में ब्रेनलैंड बुक्स अक्षर ज्ञान, अंक ज्ञान, रंग पहचान, शुरुआती गणित और पेंसिल पकड़ने जैसी क्षमताओं को विकसित करने वाली नई किताबें भी प्रकाशित करेगा। यह प्रकाशन बुज़ुर्गों के लिए भी दिमागी कसरत, पहेलियों और लॉजिकल रीजनिंग पर आधारित किताबें लाने की तैयारी कर रहा है, जो पार्किन्सन, अल्झाइमर और डिमेंशिया से जूझ रहे लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।
नीति शुक्ला की यह पहल न केवल विशेष बच्चों, बल्कि उनके माता-पिता और समाज के लिए भी उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है।





