“जाट संसद मे जाट शब्द पर बड़ा विवाद”

“29 मार्च 2026…मेरठ के सकौती टांडा में इतिहास रचा जा रहा था। सकौती स्थित हितकारी किसान इंटर कॉलेज में, अंतरराष्ट्रीय जाट संसद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में महाराजा सूरजमल की सबसे बड़ी प्रतिमा का अनावरण। हजारों जाट भाई-बहन देश-विदेश से पहुंचे थे। करीब 50 देशों के जाट शामिल हुए। अंतरराष्ट्रीय जाट संसद के तत्वावधान में आयोजित इस महाकुंभ में, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान मुख्य अतिथि थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान, राजस्थान के नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल और जाट संसद के अध्यक्ष मनु चौधरी, और संस्थापक रामअवतार पनसानिया जैसे नेता मंच पर थे।

वीर शिरोमणि महाराजा सूरजमल की उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी प्रतिमा का अनावरण किया गया। उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई और उन्हें याद किया गया। यह प्रतिमा 20 फीट ऊंची है। इसकी लागत करीब 20 लाख रुपये है। अंतरराष्ट्रीय जाट संसद के संस्थापक अध्यक्ष रामावतार पलसानिया ने कहा कि महाराजा सूरजमल की यह प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं बल्कि समाज के आत्मसम्मान,वीरता और इतिहासकी जीवंत पहचान है। पूर्व केंद्रीयमंत्री संजीव बालियान ने जाटसमाज के एकजुटता की बात की।

नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने कहा कि जाट राजनीति को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। जब जाट संगठित हुए तो चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचाने का काम किया। अब फिर हमें एकजुट होना है। 11 प्रस्ताव तय किए गए। इनमें जिन राज्यों में जाटो को ओबीसी आरक्षण नहीं मिला है वहां के जाटों को ओबीसी आरक्षण के लिए प्रयास का प्रस्ताव भी शामिल किया गया।
लेकिन महाराजा सूरजमल की उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी प्रतिमा के अनावरण के बाद जो हुआ, वो एक साधारण घटना नहीं,
बल्कि जाट-पहचान की लड़ाई बन गई है। प्रतिमा के शिलालेख से ‘जाट’ शब्द गायब कर दिया गया।
पुलिस ने रात में पट्टिका उखाड़ ली। और फिर शुरू हुई नारेबाजी, धरना और तीखी नोकझोंक। जाट- ये सिर्फ एक शब्द नहीं था…
ये सम्मान था, इतिहास था, और जाट समाज की अस्मिता का सवाल था।

आज हम समझते हैं – ये विवाद क्या था? क्यों हुआ? और इसका मतलब क्या है?”

“29 मार्च 2026… को जब गौतम बुद्ध नगर के मिहिर भोज कॉलेज में समाजवादी पार्टी की समानता भाईचारा रैली में राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक प्रभावशाली बिरादरी गुर्जर समाज के सम्राट मिहिर भोज को नमन करते हुए गुर्जर समाज की वीरता और महानता से लोगों को परिचित करा रहे थे पास के ही दूसरे जिले मेरठ के सकौती स्थित हितकारी किसान इंटर कॉलेज में, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक और प्रभावशाली बिरादरी जाट समाज के अंतरराष्ट्रीय जाट संसद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में
महाराजासूरजमल की सबसेबड़ी प्रतिमा का अनावरणकार्यक्रम हो रहा था। “महाराजा सूरजमल – जाटों के महान योद्धा, कूटनीतिज्ञ और शासक।18वीं सदी में मुगलों और अफगानों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, दिल्ली की रक्षा की। जाट समाज के लिए वो सिर्फ राजा नहीं, प्रेरणा स्रोत हैं। अंतरराष्ट्रीय जाट संसद ने मेरठ के सकौती में महाराजा सूरजमल की भव्य प्रतिमा बनवाई। नाम के आगे लिखा था – ‘महाराजा सूरजमल जाट’ ,‘अंतरराष्ट्रीय जाट संसद’ द्वारा समर्पित।“शनिवार देर रात… पुलिस के लोग प्रतिमा स्थल पहुंचे। ‘जाट’ शब्द वाली पट्टिका उखाड़ी और साथ ले गए। रविवार सुबह जब अनावरण हुआ, तो लोग हैरान रह गए। जाट शब्द गायब क्योंकि अनावरण से पहले रात में प्रशासन ने ‘जाट’ शब्द वाली पट्टिका हटवा दी थी।

जाट समाज पूछ रहा है –एक महापुरुष की प्रतिमा पर उनकी जाति का उल्लेख क्यों हटाया गया? क्या ‘जाट’ शब्द इतना विवादास्पद हो गया है कि उसे मिटाना पड़ता है? जाट संसद के कार्यकर्ता नारेबाजी करने लगे – ‘जाट शब्द वापस लगाओ!’ अंतरराष्ट्रीय जाट संसद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनु चौधरी और संस्थापक रामअवतार पनसानिया मंच पर पहुंचे। पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान और उपजिलाधिकारी के बीच तीखी नोकझोंक हुई। सांसद हनुमान बेनीवाल तो इतना नाराज हो गये कि उन्होने मंच से गरजकर कहा:
‘पुलिस ने जाट शब्द हटवाया है।  अगर बालियान जी बात नहीं करेंगे, तो हम आपके योगी जी को ही हटा देंगे!’ यानि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटाने की सीधी धमकी। भीड़ में जोश था। कुछ लोगों ने एसडीएम का घेराव कर लिया। धरना शुरू हो गया। जाट युवाओं से सकौती पहुंचने की अपील की गई।”

“संजीव बालियान ने स्पष्ट किया –-‘ये पट्टिका अंतरराष्ट्रीय जाट संसद संगठन की है, किसी जाति विशेष की नहीं।’
जाट समाज का सवाल था- महाराजा सूरजमल जाट थे, उनका गौरव जाट इतिहास से जुड़ा है,
तो जाट शब्द हटाने की क्या जरूरत?

हनुमान बेनीवाल ने चेतावनी दी – DNA मिस्टेक न हो जाए रामअवतार पनसानिया ने आरोप लगाया कि कार्यक्रम को नाकाम करने की साजिश थी – परमिशन से लेकर सुरक्षा तक पर सवाल उठाया। जाट समाज का एकमत था – ‘पहचान और सम्मान से कोई समझौता नहीं!’ “ये सिर्फ मेरठ में जाटों का मुद्दा नहीं है। जाट समाज लंबे समय से आरक्षण, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कुछ लोग ‘जाट’ शब्द को जातिवादी मानते हैं, जबकि जाट भाई कहते हैं – ये हमारी विरासत है, वीरता है, किसानी है।
महाराजा सूरजमल ने सम्राट के रूप में काम किया, लेकिन वे जाट थे। उनका योगदान उनकी जाति छिपायी क्यों जाए?

कुछ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं ये प्रशासन की सतर्कता है, ताकि जातीय तनाव न बढ़े। लेकिन जाट समाज इसे अपमान मान रहा है।

सवाल उठता है  क्या हम इतिहास को इतना sanitize कर रहे हैं कि महापुरुषों की जाति भी नहीं लिख सकेंगे?” “अंत में, दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई।

1. भाजपा नेता संजीव बालियान और आयोजकों का दावा है कि पट्टिका पर “जाट” शब्द किसी जाति विशेष के प्रदर्शन के लिए नहीं,
बल्कि “अंतरराष्ट्रीय जाट संसद” (कार्यक्रम का आयोजक संगठन) के नाम के हिस्से के रूप में लिखा था।

2. लेकिन इस पर प्रशासन ने आपत्ति की । एसडीएम और सीओ ने शासनादेश का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी जातिसूचक शब्द का प्रयोग प्रतिबंधित है, चाहे वह संगठन के नाम में ही क्यों न हो।

प्रशासन ने 10-15 दिन का समय मांगा। जाट समाज ने 15 दिन का अल्टीमेटम दिया। जाट नेताओं ने कहा – ‘15 दिन बाद अगर ‘जाट’ शब्द नहीं लगा, तो हम खुद बड़ी पंचायत करेंगे और ‘जाट’ शब्द लगाएंगे।’” जाट समाज ने प्रशासन को 15 दिन का समय दिया है कि “जाट” शब्द वाली पट्टिका को सम्मानपूर्वक वापस उसी स्थान पर लगाया जाए। धरना समाप्त हुआ, लेकिन आवाज़ बुलंद है। जाट संसद का संदेश साफ है – हम अपनी पहचान मिटने नहीं देंगे। महाराजा सूरजमल का गौरव पूरे समाज का है, लेकिन जड़ें जाट इतिहास में हैं।

ये विवाद हमें याद दिलाता है कि भारत विविधता का देश है। जाति, धर्म, भाषा – सबको सम्मान मिलना चाहिए, बिना अपमान के।”
“जाट शब्द की ये लड़ाई सिर्फ एक पट्टिका की नहीं…ये अस्मिता की लड़ाई है। जब तक जाट समाज एकजुट रहेगा, उसकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकेगी। अंतरराष्ट्रीय जाट संसद ने एक बार फिर साबित किया जाट न सिर्फ लड़ते हैं, बल्कि इतिहास भी लिखते हैं।
लेकिन प्रशासन जिस शासनादेश का हवाला दे रहा है उसे भी जान लीजिये-

दरअसल, सितंबर 2025 में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जाति के सार्वजनिक प्रदर्शन और महिमामंडन पर सख्त टिप्पणी की थी: कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों, शिलापट्टों और वाहनों पर जाति का प्रदर्शन करना “राष्ट्रविरोधी” (Anti-national) है और यह संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ है।

कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक स्थानों पर लगे ऐसे सभी बोर्ड या शिलालेख हटाए जाएं जो किसी विशेष जाति का महिमामंडन करते हों।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद, यूपी के मुख्य सचिव ने 21 सितंबर 2025 को एक विस्तृत नोटिफिकेशन जारी किया:
सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी जाति विशेष को समर्पित या जातिसूचक शब्दों वाले साइनबोर्ड लगाना प्रतिबंधित कर दिया गया।
एफआईआर (FIR), अरेस्ट मेमो और जब्ती मेमो से जाति का कॉलम हटा दिया गया है। अब पहचान के लिए जाति के स्थान पर माता का नाम अनिवार्य कर दिया गया है।

राज्य में जाति आधारित राजनीतिक रैलियों पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह विवाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को गर्मा गया है। रालोद (RLD) और सपा (SP) के नेता भी इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर जाट अस्मिता से जुड़ गया है।
फिलहाल मौके पर शांति है, लेकिन 15 दिन की समय सीमा समाप्त होने पर यदि पट्टिका वापस नहीं लगी, तो जाट समाज ने बड़ा आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

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