स्वच्छता की राह दिखाने वाला संत: संत गाडगे

क्या आपने कभी ऐसे संत के बारे में सुना है जिसने मंदिरों से ज्यादा महत्व सफाई को दिया?
यह वीडियो संत गाडगे महाराज के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने समाज को स्वच्छता, शिक्षा और मानव सेवा का सच्चा संदेश दिया।
संत गाडगे महाराज ने अंधविश्वास, जातिवाद और गंदगी के खिलाफ एक आंदोलन चलाया और लोगों को सिखाया कि असली धर्म क्या होता है।

इस वीडियो में जानिए:
– संत गाडगे महाराज का जीवन
– उनका संघर्ष और समाज सुधार
– उनके अनमोल विचार
“अगर आप भी सच्चे धर्म को समझना चाहते हैं—तो इस वीडियो को अंत तक जरूर देखें”

👉 “झाड़ू वाला संत जिसने बदल दिया भारत!”
स्वच्छता की राह दिखाने वाला संत
“एक ऐसा संत… जिसने मंदिरों से ज्यादा महत्व दिया सफाई को…
एक ऐसा समाज सुधारक… जिसने अंधविश्वास से लड़कर इंसानियत का पाठ पढ़ाया…
आज हम बात करेंगे संत गाडगे महाराज की…
जिनका जीवन खुद एक संदेश है।”
“संत गाडगे महाराज का जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले में शेणगांव अंजनगांव में एक धोबी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम – जिंगराजी रानोजी जानोरकर और माता का नाम – सखुबाई जिंगराजी जानोरकर था। घर में उनके माता-पिता उन्हें प्यार से ‘डेबू जी’ कहते थे। लेकिन उनका असली नाम था देवजी झिंगराजी जानोरकर।”
“गरीबी, कठिनाई और संघर्ष—इन सबके बीच उनका बचपन बीता।
लेकिन उन्होंने जीवन को रोने के बजाय… उसे बदलने का रास्ता चुना।”
“उन्होंने देखा कि समाज में गंदगी, अंधविश्वास और भेदभाव फैला हुआ है।
लोग मंदिर जाते थे, लेकिन अपने आस-पास की सफाई पर ध्यान नहीं देते थे।”
“तब उन्होंने एक अनोखा रास्ता चुना—
वे खुद झाड़ू उठाते, गाँव-गाँव जाकर सफाई करते।”
वे हमेशा अपने साथ एक झाडू रखते थे, जो स्वच्छता का प्रतीक था।
सार्वजनिक स्वच्छता के सिद्धांतों को मन में बिठाने के लिए वे खुद भी लगातार सक्रिय रहे और भरसक प्रयास किया। उन्होंने ‘गाडगा’ (मिट्टी का पात्र) और झाड़ू के साथ गाँव-गाँव घूमकर स्वच्छता का संदेश दिया। । वह जिस गाँव में जाते थे, झाडू-पोंछा कर स्वच्छता का संदेश देते थे।वे खुद नालियां साफ करते थे वे हमेशा एक हाथ में झाड़ू और दूसरे में ‘गाडगा’ (मिट्टी का घड़ा) लेकर चलते थे, जिससे उन्हें ‘गाडगे बाबा’ कहा गया। वे कहते थे कि ‘‘पूजा के उन फूलों से तो मेरा झाड़ू ही श्रेष्ठ है।
“अगर भगवान को पाना है…
तो पहले अपने आसपास की गंदगी को हटाना होगा।”

हांलाकि स्वयं उन्हे औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नहीं मिला था। लेकिन गाडगे बाबा शिक्षा पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने शिक्षा के महत्व को इस हद तक प्रतिपादित किया कि वह कहते थे कि यदि खाने की थाली भी बेचनी पड़े तो उसे बेचकर भी शिक्षा ग्रहण करो। हाथ पर रोटी लेकर खाना खा सकते हो पर विद्या के बिना जीवन अधूरा है।
वह कहते थे -शिक्षा कोई एक ही वर्ग की ठेकेदारी नहीं है।
वह कहते थे-एक गरीब के बच्चे को जरूर अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिये।
वे अपने प्रवचनों में शिक्षा पर उपदेश देते समय डा. अम्बेडकर को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हुए कहते थे कि ‘‘देखा बाबा साहेब अंबेडकर अपनी महत्वाकांक्षा से कितना पढ़े।’
बाबा गाडगे ने अपने समाज में शिक्षा का प्रकाश फैलाने के लिए 31 शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की।

“संत गाडगे महाराज सिर्फ सफाई और पढाई तक सीमित नहीं थे—
उन्होंने समाज की कई बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई।”
गाडगे महाराज वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले समाज सुधारक थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज में व्याप्त अज्ञानता, अंधविश्वास, भोली-भाली मान्यताओं, अवांछित रीति-रिवाजों और परंपराओं को दूर करने के लिए समर्पित कर दिया।
वह ब्राह्मणवाद, पाखंडवाद और जातिवाद के विरोधी थे। जाति प्रथा और अस्पृश्यता को बाबा सबसे घृणित और अधर्म कहते थे। उनका मानना था कि ऐसी धारणाएँ धर्म में ब्राह्मणवादियों ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए जोड़ी है। ब्राह्मणवादी इन्हीं मिथ्या धारणाओं के बल पर आज जनता का शोषण करके अपना पेट भरते हैं। इसीलिए वे लोगों को अंधभक्ति व धार्मिक कुप्रथाओं से बचने की सलाह देते थे।
संत-महात्माओं के चरण छूने की प्रथा आज भी प्रचलित है, पर संत गाडगे इसके प्रबल विरोधी थे। धर्म के नाम पर होने वाली पशुबलि के भी वे विरोधी थे। वे कहते थे कि भगवान और धर्म के नाम पर जानवरों को मत मारो।

वे व्यर्थ के कर्मकांडों, मूर्तिपूजा व खोखली परम्पराओं से दूर रहे। वे कहते थे कि भगवान पत्थर में नहीं, बल्कि इंसानों में हैं और गरीबों की सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है। उन्होंने जीवन भर लोगों को सिखाया कि “मंदिर में मत जाओ, मूर्तियों की पूजा मत करो, पोथी-पुराण, मंत्र-तंत्र, देवदेवस्की, चमत्कारों में विश्वास नहीं करो। वे हमेशा लोगों को यही उपदेश देते थे कि सभी मानव एक समान हैं, इसलिए एक दूसरे के साथ भाईचारे एवं प्रेम का व्यवहार करो। “उनका धर्म था—मानव सेवा, और उनका मंदिर था—स्वच्छ समाज।”

संत गाडगे महाराज की कीर्तन शैली अपने आप में बेमिसाल थी। उनका कीर्तन लोकज्ञान का अंग था। वे संतों के वचन सुनाया करते थे। विशेष रूप से कबीर, संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर आदि के काव्यांश वे अपने कीर्तनों के माध्यम से समाज के पाखंड और परंपरा की आलोचना करते थे। अपने कीर्तन में वे श्रोताओं को उनके अज्ञान, दोषों और दोषों से अवगत कराने के लिए विभिन्न प्रश्न पूछते थे।
हिंसाबंदी, शराबबंदी, अस्पृश्यता निवारण, पशुबलिप्रथा आदि उनके कीर्तन के विषय हुआ करते थे। उनके उपदेश भी सरल और सहज होते थे। अपने कीर्तनों में वे कहा करते थे कि चोरी मत करो, साहूकारों से कर्ज मत लो, व्यसनों में लिप्त मत हो, जातिगत भेदभाव और

छुआछूत का पालन मत करो।
वे जहाँ भी जाते, पहले सफाई करते…
फिर लोगों को इकट्ठा करके कीर्तन और प्रवचन के जरिए समझाते।

गाडगे बाबा सच्चे निष्काम कर्मयोगी थे। उन्होंने महाराष्ट्र के कोने-कोने में अनेक धर्मशालाएं, गौशालाएं, विद्यालय, चिकित्सालय तथा छात्रावासों का निर्माण कराया। उस समय दलित लोगों के पास रहने की जगह नहीं थी. ये लोग खुले आसमान में रहते थे, धूप, हवा और बारिश का सामना करते थे. संत गाडगे बाबा ने लोगों से दान एकत्र किया और धर्मशालायें बनवाई.
यह सब उन्होंने भीख मांग-मांगकर बनवाया किंतु अपने सारे जीवन में इस महापुरुष ने अपने लिए एक कुटिया तक नहीं बनवाई।
उन्होंने धर्मशालाओं के बरामदे या आसपास के किसी वृक्ष के नीचे ही अपनी सारी जिंदगी बिता दी।
एक लकड़ी, फटी-पुरानी चादर और मिट्टी का एक बर्तन जो खाने-पीने और कीर्तन के समय ढपली का काम करता था, यही उनकी संपत्ति थी।

“वे बहुत साधारण जीवन जीते थे—
“उन्होंने कभी धन इकट्ठा नहीं किया—
जो भी मिला, उसे समाज सेवा में लगा दिया।”

“आज के दौर में जहाँ लोग धर्म के नाम पर धन इकट्ठा करते हैं,
वहीं गाडगे महाराज ने धर्म के नाम पर सब कुछ त्याग दिया।”
“संत गाडगे महाराज ने हमें सिखाया कि
धर्म दिखावे में नहीं, कर्म में होता है…”

👉 उनके मुख्य संदेश:
“स्वच्छता ही सच्ची पूजा है”
“अंधविश्वास छोड़ो, शिक्षा अपनाओ”
“मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है”

“ना मंदिर, ना मस्जिद, ना कोई और द्वार,
इंसान की सेवा में ही है असली भगवान का सार।”

यह संयोग ही है कि डा. अम्बेडकर की मृत्यु के मात्र 14 दिन बाद ही मानवता का यह महान उपासक 20 दिसंबर 1956 को जनसेवा और समाजोत्थान के कार्यों को करते हुए हमेशा के लिए ब्रह्मलीन हो गया। आज बाबा गाडगे का शरीर हमारे बीच में नहीं है, लेकिन उनकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। संत गाडगे द्वारा स्थापित ‘गाडगे महाराज मिशन’ आज भी समाज सेवा में रत है। 1 मई सन् 1983 ई. को महाराष्ट्र सरकार ने नागपुर विश्वविद्यालय को विभाजित कर ‘संत गाडगे बाबा’ अमरावती विश्वविद्यालय की स्थापना की। उनकी 42वीं पुण्यतिथि के अवसर पर 20 दिसम्बर, 1998 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। सन् 2001 में महाराष्ट्र सरकार ने उनके सम्मान में ‘संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान’ शुरू किया है, जो स्वच्छता के प्रति उनके समर्पण को रेखांकित करता है।

वास्तव में गाडगे बाबा एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आप में एक संस्था थे। बाबा का जीवन और कार्य पूरे भारत के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ऐसे महापुरुष को उनके 150 वें जन्मदिवस (23 फरवरी) के शुभ अवसर पर शत-शत नमन।
“संत गाडगे महाराज का संदेश आज भी उतना ही जरूरी है— शायद उससे भी ज्यादा।”
“अगर हम सच में उन्हें याद करना चाहते हैं,
तो उनके बताए रास्ते पर चलना होगा—
स्वच्छता, सेवा और सादगी के रास्ते पर।”
“झाड़ू उठाने वाला वो संत…
आज भी हमें आईना दिखा रहा है।”

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