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कार्यपालिका को खंडहर बनाने मे न्यायपालिका, विधायिका और मीडिया ने कोई कसर नही छोड़ी….

anurag yadav iasवरिष्ठ आईएएस अधिकारी अनुराग यादव की फेसबुक वाल से साभार

प्रिय रवीशजी, पुलिसवाला तो नहीं हूँ पर पुलिस विभाग में पिताजी ने ३५ साल गुजारे इसलिए अपनी रग रग में पुलिस को हमेशा पाया है। आपके लेख से कोई असहमति नहीं हो सकती और आपकी संवेदना विषय पर बहुत सराहनीय है पर आपने उकसाया की चुप्पी नहीं रखनी चाहिए इसलिए आपके साथ बोलने का जी हुआ। पिताजी सब इंस्पेक्टर (दरोगा) के पद पर रहे और हमने उनके साथ थाने-थाने घुमते हुए लगभग १५ स्कूलों और ९/१० जिलों में १२वीं तक की पढाई की। जब भारतीय प्रशासनिक सेवा में उत्तर प्रदेश कैडर मिला तो उनके साथ के लोगों ने यही कहा की पिता के कर्मों का फल बेटे को मिला क्योकि रटने का अवसर मुझे भी कभी नहीं मिला। पुलिस वालों और उनके परिवार की त्रासदी पर कई पन्ने लिख कर सहानुभूति बटोरने का अभी अवसर नहीं क्योकि आपने महसूस करना चाहा है कि हम मुकुल और संतोष की मौत पे सोचते क्या हैं, तो आज खुद को सीमित रखूँगा सिर्फ उसी सन्दर्भ में।
कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश में जिला पंचायतो के चुनाव हुए थे और उस दौरान बनारस के एक मित्र ने मुझसे कहा की “भैया आप बड़े अफसर हैं कभी मोदी जी से मुलाकात हो तो कहियेगा की उनकी अपनी संसदीय सीट पर उनके दल वालों ने जिसको जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए लड़ाया है वो ठीक नहीं…कभी मन की बात में वो इस पर भी चर्चा करेंगे कौन से मजबूरी में ऐसे लोग उनके जैसे राष्ट्रीय दल की जरूरत बनते हैं”। उस मित्र से मैंने कहा की आप पीमओ के ट्विटर पर अपनी बात भेज दीजिये तो वो बनारसी अंदाज में ठठाते हुए “गुलाल” फिल्म के पियूष मिश्रा की लाइन “इस मुल्क ने हर शख्स को जो काम था सौंपा, उस शख्स ने उस काम की माँ….चिस जला के छोड़ दी” दोहरा दिया। उसकी बात ने मुझे कई दशकों से चल रहे इस लोकतंत्र के प्रह्सन को हंस के नजर अंदाज करने का बहाना दे दिया पर आपकी चिठ्ठी ने उस मर्म को खुरेच दिया।
धर्मेन्द्र, मेरे आईपीएस साथी ने अपने अंदाज में उस पीड़ा को बखूबी बयां किया की हम कितने बंधे होते हैं पर हम आपसे गुजारिश करना चाहते हैं कि अगर टीवी की दुनिया में शोर के साथ चल रहे ढोंग को एक्सपोज करने के लिए आप ब्लैक आउट कर मौन के साथ प्राइम टाइम पर प्रतिवाद करने का जरिया पातें हैं तो हमारी ख़ामोशी को आप हमारी कमजोरी मत मानिये । हम पल पल संघर्ष करतें हैं बस आपकी तरह हमारे दर्शक नहीं होते । हमारी कशमकश जाननी है तो फिल्म शूल के आखिरी दस मिनट में मनोज वाजपेयी के किरदार समर की वर्दी के अन्दर की कसमसाहट को एक बार देखिएगा, आपको अंदाजा हो जायेगा हम क्या महसूस करते है। हमारी पीड़ा आप मुंशी प्रेमचंद के “नमक के दरोगा” वंशीधर से पूछियेगा जिनके लिए न्याय के दरबार में कहा गया “यद्यपि नमक के दरोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है, लेकिन यह बडे खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पडा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक के मुकदमे की बढी हुई नमक से हलाली ने उसके विवेक और बुध्दि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए।”
जिस व्यवस्था में इतने वर्षों पहले मुकुल या संतोष को होशियार रहने के लिए आगाह किया गया था, उस व्यवस्था में हमारी चुप्पी को समपर्ण कहना शायद सहज है पर अगर आप दर्शकों से ये कहते नहीं थकते की टीवी देखना बंद क्यों नहीं करते और वो अगर नहीं सुधरे तो उसको उन्हें ही भुगतना होगा तो फिर दर्शकों से ये भी पूछिए कि क्यों वो ऐसा समाज बना रहे है?
हम व्यवस्था का दोष कह, खुद के पापों से मुक्त होने का बहाना नहीं ढूंढ रहे पर व्यवस्था में नौकरशाही/पुलिस सिर्फ एक स्तम्भ है और जो चार प्रमुख स्तम्भ है (व्यवस्थापिका/न्यायपालिका/प्रेस/कार्यपालिका) इनमे अगर कार्यपालिका खंडहर हो गयी है, तो इससे पहले की जो तीन हैं, उन्होंने इस खंडहर को नेस्तनाबूद करने में कोई कसर नहीं बाकी रखी है। हमारी जड़ों में इन तीनों ने पानी कम मठ्ठा ज्यादा डाला। इन्होने हमारे दरख्तों को मजबूत करने की बजाय हमें अपने वातानुकूलित ड्राइंग रूम में बोन्साई की तरह रखने की आदत बना ली और हम में से अधिकांश धूप/बारिश/आंधी तूफ़ान में जमे रहने की जगह उस वातानुकूलित कमरे में शोभायमान होने में ही अपना कर्तव्य समझने लगे। जो बोन्साई नहीं बनते वो या तो उखाड़े जाते हैं या सड़ा-गला दिए जाते हैं और आप के कैमरों में बहस सिर्फ बोन्साई बने हुओं के गुणों की होती है क्योंकि कैमरे भी एसी स्टूडियो के बाहर कभी कभार ही निकलतें हैं। मै उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का रहने वाला हूँ और आपसे जानना चाहूँगा, क्या किसी ने कभी ये जानने की कोशिश की है कि अन्नपुर्णा सिंह (डॉन बृजेश सिंह की पत्नी) किस व्यवस्था में माननीय बन गयीं थी, सिर्फ एक नाम की बात नहीं है, कसमसाहट हमें रोज होती है जब हम अख़बार के चार लाइनों के कालम में पढ़ते हैं की अदालत में मुन्ना बजरंगी या बृजेश सिंह बाइज्जत निर्दोष पाए गए और व्यवस्था में अब माफिया डान बृजेश सिंह माफिया नहीं माननीय बृजेश सिंह बन चुके हैं वो भी कहीं और से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र से। मुकुल की मौत पे हम उतना नहीं रोये थे जितना उस दिन जब ये देखा था कि इस खबर पे किसी चैनल में कोई बहस नहीं थी की ये कैसे हो रहा है। जी रवीशजी, जो समाज बृजेश को माननीय होना कबूल करता है उस समाज में हम खुद को जिन्दा वैसे भी नहीं मानते और मुकुल और संतोष की शहादत सिर्फ आहुति बन कर रह जाती है।
जवाहर बाग़ पे रामवृक्ष के कब्जे को हटाने में मुकुल और संतोष की जान गयी और रामवृक्ष जैसे शैतान की बलि पर सब एकमत हो गए पर क्या ये जनता जनार्दन अपने अन्दर रामवृक्ष का अक्स नहीं पाती जब आये दिन मंदिर/मस्जिद की आड़ में सड़कों /सरकारी जमीनों पे कब्जे को फ़लने-फुलने दिया जाता है और यही जनता जनार्दन उस कब्जे को हटाये जाने वाली ड्यूटी पर गए मुकुल या संतोष को जला देने के लिए खडी हो जाती है।
हरियाणा का जाट आन्दोलन तो ताजा तरीन उदाहरन है हमारी कमजोरी का, पर क्या कभी किसी ने ये जानने की कोशिश की है की हिंदुस्तान में जन प्रदर्शन के नाम पर हुई हिंसा या सरकारी सम्पतियों (जनता की सम्पतियों का भी) की तोड़-फोड़ में कभी किसी को सजा हुई? या किसी राजनैतिक दल से कोई जुर्माना वसूला जा सका? रामवृक्ष मूर्ख था, जो दो साल में वहां भव्य मन्दिर नहीं बनाया वर्ना कहानी कुछ और भी हो सकती थी।
हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जो गिरोहबंदों का समाज बन के रह गया है। माननीय अधिवक्ता को आप छू भी नहीं सकते(कन्हैया की पिटाई तो आपको याद ही होगी), हाल ही में लखनऊ में २० से अधिक मरीज सिर्फ इसलिए मर गए क्योंकि चिकित्सक हड़ताल पे थे (और ये कोई पहली बार नहीं हुआ) पर क्या आपको लगता है कि हम उनमें से किसी को इस बात की सजा दे पाएंगे की उन्हें हड़ताल पे नहीं रहना चाहिए था। इस गिरोहबंद होते समाज में सिर्फ उसकी चलती है जिसका अपना गिरोह होता है और ये जानकर हमारे कई साथी गिरोह का हिस्सा बनते हैं या गिरोह अपने फायदे में उन्हें अपना सदस्य बना लेता है। दुःख इस बात पे होता है की जिस मीडिया से सब का सच उजागर करने की उम्मीद होती है वो भी इस गिरोहबंदी को बढाने की सक्रिय भूमिका में रहती है। हमें याद नहीं की पिछली बार किसने हमसे रूल आफ ला( A. V. Dicey) के सिद्धांत पे चलने की उम्मीद की थी बल्कि हमें फेसिलिटेटेर होना चाहिए ये ही पाठ पढाया जाता रहा और अब तो चैनलों की बाढ़ और प्रभाव में एक अधिकारी को बढ़िया मीडिया मैनेजमेंट आना अहम् गुण माना जाता है।ये मत कहियेगा की मीडिया मैनेजमेंट स्वस्थ संवाद स्थापित करने से मतलब है क्योंकि इस पेशे को आप मुझसे बेहतर जानते हैं। आप जैसे लोग हमारी खैरियत चाहते हैं, तो और कुछ न सही अपने साथियों से कहिये कि कम से कम मीडिया मैनेजर बने अफसरों का बहिष्कार ही करने से शुरुवात करने की कोशिश हो, ये तिनका काफी होगा हमारे सहारे के लिए…अभी बहुत कुछ लिखना बाकी रह गया जो कभी किसी और ख़त में । मवाद को बहने के लिए जो नश्तर आपने चुभाया उसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया.
( एक आन लाइन पाति का उत्तर आन लाइन पाति के रूप में दिया गया है और किसी व्यक्ति या संस्था विशेष को वर्तनी की गलती अथवा व्यक्त विचारों से यदि कोइ तकलीफ हो तो unconditional apology).
अनुराग यादव (भारतीय प्रशासनिक सेवा, उ.प्र.), उन सभी साथियों की ओर से जिन्हें अपनी लाल बहादुर शास्त्री एकडेमी के गीत पे फक्र है, “रहो धर्म में धीर, रहो कर्म में वीर रखो उन्नत शिर डरो ना.”

 

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