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जयललिता के निधन के दस दिन बाद, क्यों हुआ दोबारा अंतिम संस्कार ?

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चेन्नई,  तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के दस दिनों के बाद दोबारा उनका अंतिम संस्कार किया गया । जयललिता के परिवार ने उनका दोबारा अंतिम संस्कार दाह संस्कार के रूप मे किया है। जयललिता का निधन 5 दिसंबर को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में हुआ था।जयललिता की करीबी दोस्त शशिकला ने उनके अंतिम संस्कार की आखिरी रस्मों को पूरा किया था।

जन्म से ब्राह्मण और माथे पर अक्सर आयंगर नमम लगानेवाली जयललिता को दफनाया गया था। वैसे तो आयंगर ब्राह्मणों में दाह संस्कार की परंपरा है, बावजूद तमिलनाडु सरकार ने जयललिता को दफनाने का फैसला लिया। कुछ लोग इसे द्रविड़ आंदोलन से जोड़ कर देखते हैं। उनके मुताबिक द्रविड़ आंदोलन के बड़े नेता मसलन पेरियार, अन्नादुरई व एमजी रामचंद्रन जैसी शख्सियतों को दफनाया गया था।

सूत्रों के अनुसार, जयललिता के निधन के बाद द्रविड़ नेता एमजी रामचन्द्रन के स्मारक के निकट उन्हें दफनाया गया था। उनका दाह संस्कार नहीं किए जाने से उनके रिश्तेदारों ने इस पर नाराजगी जाहिर की थी। उनका कहना था कि जयललिता अयंगकर ब्राहमण समुदाय से जुड़ी थीं और इसमें दाह संस्कार की परंपरा है। यही वजह है कि श्रीरंगापट्टनम में जयललिता का एक बार फिर अंतिम संस्कार किया गया। इस बार जया का दाह संस्कार अयंगकर समुदाय के रीति-रिवाज से और पूरे विधि-विधान से उनके अंतिम संस्कार को अंजाम दिया गया। जयललिता को मोक्ष की प्राप्ति हो, इसलिए उनके रिश्तेदारों ने बुधवार को उनका हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया। परिवार का मानना था कि दफनाए जाने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई है इसलिए ऐसा करना जरूरी था।

सूत्रों के अनुसार, मंगलवार को श्रीरंगपटना में कावेरी नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार फिर से किया गया। इस दाह संस्कार में उनके शव की जगह गुड़िया को रखा गया था। मुख्य पुजारी रंगनाथ लंगर ने उनके दाह संस्कार की रस्में पूरी करवाईं। दाह संस्कार में जयललिता के शव की जगह एक गुड़िया को उनकी प्रतिकृति मानते हुए रखा गया। इस संबंध में पुजारी ने कहा कि इस संस्कार से जयललिता को मोक्ष की प्राप्ति होगी। संस्कार से जुड़े कुछ और कर्म अभी शेष हैं, जो अगले पांच दिन तक पूरे कर लिए जाएंगे। रिश्तेदारों का ऐसा मानना था कि जयललिता को दफनाया गया, उनका दाह संस्कार नहीं किया गया, इसिलए मोक्ष की प्राप्ति के लिए दोबारा ऐसा किया जाना जरूरी था।

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