इस रिपोर्ट ने खोली, मीडिया की पोल?

“लोकतंत्र की नींव… सिर्फ चुनाव नहीं,इसमें महत्वपूर्ण भूमिका , स्वतंत्र और निर्भीक मीडिया की भी है क्योंकि “खबरें सिर्फ जानकारी नहीं होतीं…वे लोकतंत्र की सांस होती हैं। लेकिन जब यह सांस घुटने लगे… तो? क्या भारत में यह नींव कमजोर पड़ रही है?”
जी हां, स्थिति गंभीर है…… दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ यानि भारत में प्रेस की आज़ादी संकट में है।’
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 के आंकड़े डराने वाले हैं।” “2026 की World Press Freedom Index रिपोर्ट… एक चेतावनी है।” “हर साल, Reporters Without Borders , जिसे मूल रूप से ‘रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स’ या RSF कहा जाता है, दुनिया के 180 देशों में प्रेस की स्वतंत्रता को मापता है।”और प्रत्येक देश की World Press Freedom Index रिपोर्ट जारी करता है, ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (Reporters Without Borders) द्वारा जारी किए गए, 2026 के ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर आगया है। जबकि 2025 के इंडेक्स में भारत 151वें स्थान पर था, भारत की मौजूदा रैंकिंग में छह स्थानों की गिरावट आई है। रैंक जितनी बड़ी संख्या, स्थिति उतनी कमज़ोर 180 देशों में 150+ रैंकिंग का मतलब है कि प्रेस फ्रीडम को लेकर गंभीर चुनौतियाँ हैं
भारतीय मीडिया की ये कड़वी सच्चाई है
इस इंडेक्स में नॉर्वे, नीदरलैंड्स, एस्टोनिया, डेनमार्क और स्वीडन सबसे ऊपर हैं। यानि इन देशों में प्रेस स्वतंत्रता यानि पत्रकारिता की स्थिति सबसे अच्छी है। वहीं, सबसे नीचे के स्थानों पर सऊदी अरब, ईरान, चीन, उत्तरी कोरिया और इरिट्रिया हैं।
वहीं, भारत के लगभग सभी पड़ोसी देश इस इंडेक्स में भारत से ऊपर हैं – पाकिस्तान 153वें स्थान पर, भूटान 150वें पर, नेपाल 87वें पर,
श्रीलंका 134वें पर और बांग्लादेश 152वें स्थान पर है। हालाँकि, चीन 178वें स्थान पर है।
भारत 157वें स्थान पर है – जो कि फ़िलिस्तीन से भी एक स्थान नीचे है; फ़िलिस्तीन में पिछले दो सालों से इज़रायल द्वारा नरसंहार किया जा रहा है।
“यह कड़वी सच्चाई है कि युद्ध झेल रहे देशों से भी नीचे हमारा स्थान है। भारत अब ‘फ्री प्रेस’ से हटकर ‘चिंताजनक’ श्रेणी में शामिल हो चुका है।” अब बड़ा सवाल उठता है कि- “क्या भारत में मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है… या सत्ता के दबाव में है?”
RSF भारत में प्रेस की आज़ादी के संकट के पीछे, पत्रकारों के ख़िलाफ़ हिंसा में बढ़ोतरी, मीडिया पर कुछ ही लोगों का ज़्यादातर मालिकाना हक़, और ऐसे मीडिया आउटलेट्स जिनका झुकाव किसी एक राजनीतिक पार्टी की तरफ़ साफ़ तौर पर दिखता है– इन सब कारणों को मानता है। – इन सब कारणों से “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र” में प्रेस की आज़ादी को संकट में मानता है।
कारण
“2026 की World Press Freedom Index रिपोर्ट…के अनुसार, भारत, जो कभी ‘फ्री प्रेस’ का उदाहरण माना जाता था… अब ‘चिंताजनक’ श्रेणी में पहुंच चुका है।” “ World Press Freedom Index पांच मुख्य मापदंडों पर आधारित होता है—
राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक और सुरक्षा।”
आईये जानतें हैं ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ क्या कहता है भारतीय प्रेस की इस ‘चिंताजनक’ श्रेणी के बारे में –
1 – राजनीतिक संदर्भ
‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ 2026 की रिपोर्ट मे कहा गया है कि- “आज भारत में, कई मीडिया संस्थानों पर अप्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण देखने को मिलता है।” देश की फ़ैक्ट-फ़ाइल बताती है कि- देश में मीडिया का दायरा बहुत बड़ा है, वहीं “2014 के बाद से भारतीय मीडिया एक ‘अघोषित आपातकाल’ की स्थिति में पहुँच गया है।
जब से नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए हैं और उन्होंने अपनी पार्टी, BJP और भारत के बड़े मीडिया संस्थानों के परिवारों के बीच जबर्दस्त तालमेल बिठाया है, तब से भारत का मीडिया “अनऑफिशियल इमरजेंसी” यानि अघोषित आपातकाल में चला गया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ग्रुप के प्रमुख मुकेश अंबानी, जो प्रधानमंत्री के करीबी दोस्त हैं, 70 से ज़्यादा मीडिया आउटलेट्स के मालिक हैं, जिन्हें कम से कम 800 मिलियन भारतीय फॉलो करते हैं। 2022 के आखिर में मोदी के करीबी टाइकून गौतम अडानी द्वारा NDTV चैनल को खरीदना, मेनस्ट्रीम मीडिया में विचारों की विविधता (pluralism) के खत्म होने का संकेत था।
हाल के वर्षों में “गोदी मीडिया” का भी उदय हुआ है – ऐसे मीडिया संस्थान जो पॉपुलिज़्म लोकलुभावन वाद और BJP के पक्ष में प्रोपेगैंडा को जोड़ते हैं। दबाव और असर के ज़रिए, प्लूरलिस्ट यानि विविधतावादी प्रेस के भारतीय मॉडल पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते, सिर्फ़ उन पत्रकारों और यूट्यूबर्स को इंटरव्यू देते हैं जो उन्हें अच्छी तरह से कवर करते हैं। जो उनके प्रति वफ़ादारी नहीं दिखाते, उनकी बहुत बुराई करते हैं। भारतीय पत्रकारों को सोशल मीडिया पर BJP के सपोर्ट वाले ट्रोल्स परेशान करने वाले कैंपेन चलाकर शिकार बनाते हैं।
2- आऱ्थिक संदर्भ
“मीडिया का ऑक्सीजन है ‘विज्ञापन’। और भारत में विज्ञापन का सबसे बड़ा स्रोत सरकार है। जब अरबों का सरकारी फंड विज्ञापनों पर खर्च होता है, तो मीडिया हाउस दबाव में आ जाते हैं। यह ‘सेंसरशिप’ का एक मौन हथियार है।” ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ 2026 की रिपोर्ट मे आऱ्थिक संदर्भ में कहा गया है कि- भारत का मीडिया मुख्य रूप से एडवरटाइजिंग रेवेन्यू से फंडेड होता है, जिसका मुख्य श्रोत सरकार है, नरेंद्र मोदी के राज में, एडवरटाइजिंग पर अरबों डॉलर का पब्लिक फंड खर्च किया गया है। केंद्र और राज्य दोनों सरकारें इस फंडिंग के ज़रिए मीडिया पर अपने कंटेंट को सेंसर करने का दबाव डालती हैं, जिस पर कई छोटे मीडिया संस्थान निर्भर हैं। जहाँ एक तरफ, सरकार ने सरकारी और प्राइवेट मीडिया दोनों पर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है, वहीं मीडिया ओनरशिप कुछ ग्रुप्स के हाथों में बहुत ज़्यादा केंद्रित हो गई है जो ज़्यादातर सरकार से जुड़े हुए हैं,
कारण 3 – कानूनी संदर्भ
“ भारत में कानून, जो पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे… अब डर का कारण बन रहे हैं?” “कई मामलों में कानूनों का इस्तेमाल पत्रकारों को चुप कराने के लिए किया जाता है।” ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ 2026 की रिपोर्ट मे कानूनी संदर्भ में कहा गया है कि-
भारतीय संविधान में प्रेस की आज़ादी का ज़िक्र नहीं है, लेकिन यह अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार से सुरक्षित है। हालाँकि, सरकारें मीडिया को दबाने के लिए देशद्रोह, बदनामी और देश विरोधी गतिविधियों जैसे पुराने कानूनों का इस्तेमाल करने से कभी नहीं हिचकिचाई हैं। पत्रकारों के ख़िलाफ़ आतंकवाद विरोधी कानूनों का तेज़ी से इस्तेमाल हो रहा है। पत्रकारों को डराने-धमकाने और बदले की कार्रवाई के लिए उनके ख़िलाफ़ कानूनी नियमों का इस्तेमाल किया है। मोदी सरकार कई नए कानून लाई हैं जो सरकार को मीडिया को कंट्रोल करने, न्यूज़ को सेंसर करने और आलोचना करने वालों को चुप कराने की बहुत ज़्यादा ताकत देते हैं, जिसमें 2023 टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी अमेंडमेंट रूल्स और 2023 डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट शामिल हैं।
कारण 4 – पत्रकारों की सुरक्षा
दुनिया भर में पत्रकारिता को अब रिस्क से ज़्यादा अपराध के तौर पर देखा जा रहा है। “सच्चाई दिखाने की कीमत… कई बार जान तक हो सकती है।” ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ 2026 की रिपोर्ट मे पत्रकारों की सुरक्षा के संदर्भ में कहा गया है कि- भारत में हर साल औसतन दो से तीन पत्रकारों की उनके काम की वजह से हत्या हो जाती है, ऐसे में भारत , मीडिया प्रोफेशनल्स के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक है। जो पत्रकार सरकार की आलोचना करते हैं, उन्हें अक्सर ऑनलाइन उत्पीड़न, डराने-धमकाने, जान से मारने की धमकियों और शारीरिक हमलों का सामना करना पड़ता है; साथ ही उन पर आपराधिक मुकदमे भी चलाए जाते हैं और उन्हें मनमाने ढंग से गिरफ्तार भी किया जाता है। ये पत्रकार पुलिस अधिकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, आपराधिक गिरोहों और भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों—सभी की हिंसा का शिकार बन सकते हैं। हिंदुत्व के समर्थक— उन लोगों से जो हिंदू दक्षिणपंथी विचारधारा को मानते हैं—उन आलोचकों के खिलाफ आम लोगों से बदला लेने का आह्वान करते हैं, जिन्हें वे “गद्दार” और “राष्ट्र-विरोधी” करार देते हैं।
सोशल मीडिया पर नफ़रत फैलाने के लिए सुनियोजित और खौफ़नाक अभियान चलाए जाते हैं, जिनमें हत्या के लिए उकसाया जाता है;
ये अभियान तब और भी ज़्यादा हिंसक हो जाते हैं, जब इनका निशाना महिला पत्रकार होती हैं—जिनका निजी डेटा भी सार्वजनिक कर दिया जाता है।
पर्यावरण से जुड़े विषयों या कश्मीर की ख़बरों को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए भी हालात बेहद चिंताजनक हैं; यहाँ रिपोर्टरों को अक्सर पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा परेशान किया जाता है, और उनमें से कुछ को तो कई-कई सालों तक तथाकथित “अस्थायी” हिरासत में भी रखा जाता है। पत्रकारों को ‘देशद्रोही’ करार देना एक सामान्य चलन बन गया है।”
5- सोशियो-कल्चरल कॉन्टेक्स्ट
भारत के मीडिया संस्थानों के न्यूज़ रूम में आज भी विविधता का अभाव है। ऊँची जातियों का वर्चस्व और महिला प्रतिनिधित्व की कमी न्यूज़ के नज़रिए को पक्षपाती बनाती है। टीवी चैनलों का प्राइम टाइम अब बहस का नहीं, बल्कि नफ़रत और धार्मिक ध्रुवीकरण का मंच बन गया है। ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ 2026 की रिपोर्ट मे भारत के सोशियो कल्चरल कांटेक्स्ट के बारे में कहा गया है कि-
भारतीय समाज की विशाल विविधता मीडिया के क्षेत्र में ठीक से नहीं दिखती। जर्नलिज़्म का प्रोफेशन, खासकर मैनेजरियल पोजीशन पर, ऊंची जातियों के हिंदू पुरुषों का खास अधिकार बना हुआ है, ओबीसी, एससी, एसटी वर्ग के लोगों की संख्या नगण्य है।
– यह एक ऐसा बायस है जिसका असर लेखों और रिपोर्ट के एंगल और सब्जेक्ट पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, शाम के टीवी टॉक शो में, गेस्ट में 15% से भी कम महिलायें होती हैं।
हिंदू राष्ट्रवादिता की विचारधारा एक बड़ी ताकत बन गई है, जो खबरों को आकार दे रही है, राजनैतिक डिबेट को फ्रेम कर रही है और उस जगह को कम कर रही है जहाँ अलग राय रखने वालों या अल्पसंख्यकों की आवाज़ें सुनी जा सकती हैं। ज़्यादातर टीवी मीडिया आउटलेट, खासकर हिंदी भाषी संस्थानों में, अपने एयरटाइम का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक खबरों को देते हैं, कभी-कभी खुले तौर पर मुसलमानों से नफ़रत का सपोर्ट करते हैं।
असर – समाज पर प्रभाव “जब किसी देश में मीडिया दबाव में होता है… तो असर सिर्फ पत्रकारों पर नहीं, पूरे समाज पर पड़ता है।”
“सच की जगह शोर ले लेता है… और जनता तक अधूरी या पक्षपातपूर्ण जानकारी पहुंचती है।”
निष्कर्ष और उम्मीद
“चुनौतियां हैं… लेकिन उम्मीद भी है।”
“हर वो पत्रकार जो सच्चाई के लिए खड़ा है…
“हर वो पत्रकार जो आज भी बिना डरे लिख रहा है,
और हर वो नागरिक जो सवाल पूछने की हिम्मत रखता है…
वही इस लोकतंत्र की असली ताकत है।”
“याद रखिये, स्वतंत्र मीडिया ही एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।
आवाज़ें खामोश न होने दें।”




